गजेन्द्र गमने याय स करुण दिठे चाय
वे गजराज के समान चलते हैं, उनकी दृष्टि करुणा से भरी है। उनके कदमों के भार से धरती काँप उठती है। उनकी चाल मतवाले सिंह की चाल को भी हरा देती है। उनके बारे में सुनकर पाषण्डी भय से व्याकुल हो जाते हैं।
वे महान अवधूत हैं, करुणा के सागर हैं। प्रेम से हृदय भरकर वे हरि-संकीर्तन में विहार करते हैं। वे पतित-पावन हैं, दीनों के बन्धु हैं।
चलते हुए वे गर्जना करते हैं। चर और अचर सबको, यहाँ तक कि देवताओं को भी, वे प्रेम के अमृत में तैरा देते हैं। अपने साथियों के साथ वे तरह-तरह की आनन्दमय लीलाएँ करते हैं। कोई नहीं समझ पाता कि वे यह सब कैसे करते हैं।
वे शेषशायी संकर्षण हैं, वे ही समस्त अवतारों के मूल भगवान नारायण हैं। उनसे ही अंश और कला अवतार प्रकट होते हैं। वे कृपा के सागर हैं, भक्ति के दाता हैं, समस्त जगत का कल्याण करने वाले हैं। वे ही रोहिणीनन्दन बलराम हैं।
वे लीला और लावण्य के धाम हैं, आगम-निगम शास्त्र उनकी महिमा का गान करते हैं। उनका रूप कामदेव को भी मोहित कर देने वाला है। एक निर्धन संन्यासी का वेश धारण करके वे देश-देश में घूमते हैं और तीनों लोकों का उद्धार करते हैं।
व्रज में उनकी बुद्धि, विनोद और लीलाएं सभी सर्वोत्तम हैं। बलरामदास कहते हैं कि यदि तुम अपना मन उन्हें पाने में लगा दो, तो तुम्हारी सभी इच्छाएं पूर्ण हो जाएंगी। इसलिए उनके श्रीचरणों की भक्ति करो, भक्ति करो।
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