गोरा दयार अबधि गुण निधि
भगवान गौर गुणों के भण्डार हैं। उनकी दया सब दया की चरम सीमा है। नदिया के नगरों में और गंगा के तट पर भगवान गौरांग निरन्तर लीलाएँ करते हैं।
वे चलने का प्रयास करते हैं। उनमें ऐसा करने की शक्ति नहीं है। दो भक्तों के कन्धों पर अपनी दोनों भुजाएँ टिकाए हुए भगवान गौरचन्द्र रोते हुए पुकारते हैं, “हरि! हरि!”
उनकी आँखों से भावमय प्रेम के आँसुओं की कितनी ही उमड़ती हुई नदियाँ बह रही हैं? उनके शरीर के रोम खड़े हैं। पृथ्वी में उनके गौर रूप को धारण करने की शक्ति नहीं है।
अपने पार्षदों से घिरे हुए वे घूमते और नाचते हैं। वे “हरि! हरिबोल!” पुकारते हैं। दो प्रिय सखाओं के कन्धों पर अपनी भुजाएँ डाले हुए वे डगमगाते हुए चलते हैं।
वे सारे संसार को भावमय दिव्य प्रेम से उद्वेलित कर देते हैं। इसीलिए उनका नाम पतितपावन (पतितों को पवित्र करने वाले) है। उनकी महिमा सुनकर परमानन्द को केवल उन्हीं पर विश्वास है। परमानन्द के हृदय में किसी और प्रकार का विश्वास नहीं टिकता।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- परमानन्द दास
- पद
- 5