होरी खेलत गौर किशोर
AI-निर्मित अनुवाद — समीक्षा लंबित
किशोर गौर रसवती नारी गदाधर की गोद में होली खेलते हैं। उनके मुख पर पसीने की बूँदें हैं और शरीर पर रोमाञ्च है।
भाव में विभोर होकर उनके नेत्रों से अश्रु बहते हैं। नरहरि के साथ वे व्रज का रस गाते हैं, और मुकुन्द, मुरारि तथा वासु आनन्द से नाचते हैं।
वे बार-बार गदाधर पण्डित की गोद में मूर्छित हो जाते हैं। यह देखकर सब साथी भाव में विभोर हो जाते हैं। फिर प्रभु निकुञ्ज-मन्दिर में लेट जाते हैं।
भूमि पर गिरकर वे कहते हैं, “मेरी मुरली कहाँ है? गोवर्धन और यमुना का तट कहाँ है? मालती, जूही और चम्पा के फूल कहाँ हैं?”
शिवानन्द कहते हैं: रस से भरी यह वाणी सुनो। जहाँ प्रभु और गदाधर हैं, वहीं रस की खान है।