जय जग तारण कारण धाम
जय हो, जय हो! जगत् के उद्धारक, सभी कारणों के कारण, समस्त आनन्द के मूल, नित्यानन्द नाम धारण करने वाले प्रभु की जय हो!
उनके अश्रुपूर्ण नेत्र निद्रा से मुँदते जाते हैं। उनकी चाल अस्थिर हो गई है, जैसे वे मत्त हो गए हों। वे बार-बार पुकार उठते हैं, 'हे सखा अभिराम!' गौर-प्रेम से अभिभूत होकर अब उनमें चलने की भी शक्ति नहीं रही।
गद्गद स्वर में वे मधुर टूटे-टूटे शब्द बोलते हैं, उनके वचन अमृत के समान मधुर हैं। उनके कपोल मधुर हास्य से खिल उठते हैं। वे पाषण्डियों को चूर-चूर कर देते हैं। उनकी सुडौल भुजाएँ स्वर्ण-आभूषणों से सुशोभित हैं और वे हाथ में एक दण्ड धारण किए हुए हैं।
कलियुग के काल रूपी सर्प की जकड़ में चर और अचर सब प्राणियों को जलते देखकर, वे सारे जगत पर प्रेम-सुधा-रस बरसाते हैं। फिर गोविन्द दास की उपेक्षा क्यों?