जय जय ब्रज बासी श्रेष्ठ नन्द राज
जय जय नन्द महाराज की, जो व्रजवासियों में सर्वश्रेष्ठ हैं! जय जय व्रज की रानी की, जो गोपियों में सर्वश्रेष्ठ हैं!
जय जय बलराम की, जो रोहिणी के पुत्र हैं! जय जय राधा-कृष्ण की, जो समस्त माधुर्य के धाम हैं!
जय जय सुन्दरी ललिता की, जो राधा की सखी हैं! वे राधा की सखियों में सर्वश्रेष्ठ हैं। उनका रूप मधुर सौन्दर्य और माधुर्य से भरा है।
जय जय श्री विशाखा, चम्पकलतिका, रंग-देवी, सुदेवी, तुंगविद्या और इन्दुरेखा की!
जय जय अनंग-मंजरी की, जो राधा की छोटी बहन हैं! उनके रूप का मधुर सौन्दर्य और माधुर्य तीनों लोकों को भी परास्त करता है।
जय जय पौर्णमासी की, जिन्हें मैं योगमाया ही कहता हूँ। वे बड़ी सावधानी और चतुराई से राधा-कृष्ण की लीलाओं की व्यवस्था करती हैं।
जय जय वृन्दा-देवी की, जो कृष्ण को अत्यन्त प्रिय हैं! जय जय वीरा-सखी की, जो सभी के हृदय को आनन्दित करती हैं!
जय जय रत्न-मण्डप और रत्न-सिंहासन की! जय जय उन गोपियों की, जो राधा-कृष्ण की सखियाँ और सहचरी हैं!
सुनो, सुनो, हे मेरे भाई। व्रज में राधा-कृष्ण की सेवा का चिन्तन करो। प्रार्थना करो कि तुम वहाँ उनकी सेवा प्राप्त करो।
अन्य सभी कर्मों को त्याग दो। व्यर्थ गपशप को त्याग दो। व्रज में राधा-कृष्ण का चिन्तन करो।
जो कोई इन सभी लीला-स्थानों का स्मरण करता है, जन्म-जन्म मैं उसके चरण अपने सिर पर धारण करता हूँ।
अपने गुरु और वैष्णवों के चरण-कमलों को ही अपना एकमात्र लक्ष्य मानकर, नरोत्तम दास यह नाम-संकीर्तन गाते हैं।