जय जय श्री कृष्ण चैतन्य दया सिन्धु
श्री कृष्ण चैतन्य की जय हो, जय हो, जो दया के सागर हैं! दीनों के मित्र की जय हो! पतितों के उद्धारकर्ता की जय हो!
प्रेम-भक्ति का दान देने वाले प्रभु की जय हो! हे प्रभु, मुझ पर दया कीजिए। दाँतों के बीच तिनका दबाकर यह तुच्छ सेवक आपको पुकार रहा है।
प्राचीन काल में आपने स्वयं अनेक पापियों का उद्धार किया। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं, क्योंकि इसीलिए आप इस भौतिक जगत् में अवतरित होते हैं।
अब मुझ जैसे पापियों का उद्धार कीजिए। सारे लोक आपकी अद्भुत दया का गुणगान करते हैं।
यदि आप समझते हैं कि मैं आपकी दया पाने के योग्य नहीं हूँ, तो कृपा करके मुझे योग्य बना दीजिए।
कलियुग में आपकी दया की प्रतिज्ञा के बारे में सुनकर पापी राधामोहन आपकी शरण लेने की याचना करता है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- राधामोहन
- पद
- 6