माधव, बहुत मिनति करि तोय
हे माधव, तुलसी-पत्र और तिल की इस भेंट के साथ मैं आपसे विनती करता हूँ और अपना शरीर आपकी सेवा में समर्पित करता हूँ। मैं जानता हूँ कि आपकी करुणा ऐसी है कि आप मुझे नहीं ठुकराएँगे।
इस प्रार्थना पर विचार करते समय आप केवल मेरे दोष ही गिन पाएँगे। आपको मुझमें गुणों का लेशमात्र भी नहीं मिलेगा। आप सारी सृष्टि में जगन्नाथ (जगत् के स्वामी) के नाम से जाने जाते हैं। तो फिर क्या मुझ तुच्छ जीव को, जो इसी जगत् के भीतर रहता है, आपको अपना स्वामी मानने का अधिकार नहीं है?
जन्म-जन्म में अपने कर्म के फलस्वरूप मैं बार-बार आता-जाता रहता हूँ, कभी मनुष्य, कभी पशु, और कभी पक्षी, कीड़ा या कीट के रूप में। परन्तु जिस भी जन्म में मैं आऊँ, मेरा मन सदा आपकी कथाओं में लगा रहे।
गहरे पश्चाताप के साथ कवि विद्यापति विनम्रता से प्रार्थना करते हैं, “हे माधव, हे पतितों के मित्र, कृपया इस तुच्छ व्यक्ति को अपने चरण-कमलों के कोमल पल्लव में आश्रय दीजिए। इस प्रकार मैं इस भवसागर को पार कर सकूँगा।”
इस भजन के बारे में
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ऑडियो के लिए आभार: इस्कॉन डिज़ायर ट्री। सभी भक्त गायकों की जय।