माघे शुक्ला तिथि सप्तमीते अति
माघ मास की शुक्ल सप्तमी को आनन्द का महासागर उमड़ पड़ा। जब सभी नक्षत्र शुभ थे, उस शुभ क्षण में अद्वैतचन्द्र प्रभु इस जगत में अवतरित हुए और नाभा देवी के गर्भ से जन्म लिया।
अत्यन्त हर्षित होकर कुबेर पण्डित ने निर्धन ब्राह्मणों को अनेक प्रकार के दान दिए। फिर वे धीरे-धीरे सूतिकागृह की ओर गए। पुत्र का मुख देखकर उनका हृदय शीतल आनन्द से भर गया।
नवद्वीप के सभी लोग वहाँ दौड़कर आए। वे आपस में कहते थे, "हमने ऐसा बालक कभी नहीं देखा। इस पुण्य घड़ी में कुबेर पण्डित ने बुढ़ापे में पुत्र-रत्न पाया है।"
देवताओं ने फूलों की वर्षा की। शिशु अद्वैतचन्द्र की महिमा जैसी महिमा किसी ने कभी नहीं देखी। उनकी महिमा का कोई सानी नहीं है। सारा जगत "जय! जय!" की ध्वनि से भर गया। घनश्याम दास इन शुभ लीलाओं का वर्णन करते हैं।