मरि ना लो नदीयार माझारे ओ ना रूप
अहा! अहा! सोने के समान अद्भुत और तेजस्वी श्री गौरांग नदिया में नाच रहे हैं।
उनके माथे पर तिलक चमक रहा है। वे प्रेम के अमृत में डूबे ही जा रहे हैं। उनकी आँखें अब लालिमा लिए हुए हैं।
उनके होंठों पर मन्द मुस्कान है। उनकी बातें मधुर हैं। अपनी गर्दन तिरछी करके वे एक दृष्टि डालते हैं। वे आह भरते हैं।
उनका वक्षस्थल आगे-पीछे झूमता है। उसके साथ उनकी रंगण फूलों की माला भी झूमती है। वे कितनी अमृतमयी लीलाओं का आनन्द लेते हैं? वे प्रेम के कितने अमृत का स्वाद लेते हैं?
उनके अंगों पर चन्दन का लेप लगा है। वे मनोहर और लीलामय हैं। सुगन्धों का राजा चम्पक का फूल उनके घुँघराले बालों को सजा रहा है।
देवकीनन्दन कहते हैं: हे नासमझ सखी, कृपया सुनो। तुम उस सत्य को क्यों नहीं मानती, इस सत्य को कि गौर प्रभु स्वयं कृष्ण हैं, वही कृष्ण जो रसिक किशोर हैं और वन के फूलों की माला पहनते हैं?
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- देवकीनन्दन दास
- पद
- 6