नाचये अद्वैत प्रेम राशि
प्रेम से भरकर अद्वैत प्रभु नाचते हैं। भगवान गौर की महिमा के कीर्तन में मग्न होकर उन्हें दिन-रात का भी भान नहीं रहता।
'गौर! गौर!' कहते हुए उन्हें कितना सुख मिलता है? भगवान गौर की महिमा का ठीक से गान करने के लिए वे कितने ही लाखों मुखों की कामना करते हैं?
वे अपनी छाती पीटते हुए 'गौर!' का जाप करते हैं। बचने का कोई मार्ग न पाकर कलियुग भय से कांप उठता है।
भगवान गौर के नाम का जाप करते हुए अद्वैत प्रभु के हृदय में कौन-सी उमंग भर जाती है? उनके शरीर के रोम पुलकित हो उठते हैं। वे इधर-उधर झूमते हैं।
क्या उनके साथी भी प्रेम के अमृत का स्वाद पाकर उन्मत्त नहीं हो गए हैं? वे भगवान गौरचन्द्र की कितनी ही लीलाओं का गुणगान करते हैं?
खोल और करताल की ध्वनि सुनकर स्त्रियाँ भी उमंग से रो पड़ती हैं।
अद्वैत प्रभु की महिमा से सभी लोक भर जाते हैं। अब दीन, पतित, मूर्ख और पापी सभी प्रेम के अमृत में तैरते हैं।
दयामय अद्वैत प्रभु के चरणों से कोई कैसे विमुख हो सकता है, वे अद्वैत प्रभु जो नरहरि दास के प्राण हैं?