नाचे पहुं अबधुत गोरा
अवधूत भगवान गौर नृत्य करते हैं। उनके मुख का पूर्ण चन्द्रमण्डल निरन्तर महामंत्र के अमृत का आस्वादन करता रहता है।
उनकी लाल आँखें लाल कमल की पंखुड़ियों को भी जीत लेती हैं। उनकी आँखों की पुतलियाँ काले भौंरों जैसी हैं। उनके वक्ष पर दिव्य प्रेम के आँसुओं की धारा ऐसे बहती है, जैसे स्वर्ण-पर्वत से स्वर्गीय गंगा बहती हो।
उनकी कमर सिंह की कमर को भी जीत लेती है। वे कौपीन और केसरिया बाहरी वस्त्र पहनते हैं। उनके गले में दमनक के फूलों की माला पड़ी है। उनके आभूषण चमक रहे हैं। उनकी नाक तिल के फूल जैसी है।
उनकी दो सुन्दर भुजाएँ दो सोने की कमल-नालों जैसी हैं। उनके हाथ दो हाथी की सूँड़ों की तरह खेलते हैं। लाल कमल के फूल उनकी बराबरी नहीं कर पाते। भगवान गौर का स्पर्श पृथ्वी को आनन्द से भर देता है।
सिर से पैर तक उनके शरीर के रोम खड़े हैं, और वे रोम खिले हुए नीले फूलों की तरह शोभा दे रहे हैं। उनका काँपता हुआ शरीर भोर के समय के केले के पेड़ जैसा है। माधव घोष का मन भगवान गौर का संग पाने के लिए तरसता है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- माधव घोष · जीवनी पढ़ें
- पद
- 5