निशि परभात समये किये पेखलुं, रसम्यअ गौर किशोर
भोर के समय मैंने मनोहर भगवान गौरकिशोर को देखा। उनके अंग चन्दन और कुंकुम से लिप्त थे, और उनके आभूषण चमक रहे थे।
उन्होंने सारी रात कीर्तन किया था। सारी रात वे दिव्य प्रेम के आवेश में नृत्य करते रहे। उनके सुन्दर शरीर के रोम खड़े हो गए थे। उनकी लीलाएँ उज्ज्वल थीं।
उनकी लाल आँखें चंचल थीं। पलक झपकते ही उनके भीतर दिव्य प्रेम का भाव उमड़ आया। वे हल्का-सा मुस्कुराए।
भगवान गौर की लीलाओं के सत्य का वर्णन कौन कर सकता है? उन्हें समझने की शक्ति मुझमें नहीं है। मनमथ कहते हैं, भगवान गौर, जिन्हें पाना अत्यन्त कठिन है, अब नदिया में लीला-विहार करते हैं। वे दया के सागर हैं, और अब अपने चरणों के नीचे कलियुग के पापों को कुचलते हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- मन्मथ दास
- पद
- 4