निता इ चान्देर गुण कि कहब आर
निताईचन्द्र की महिमा का और क्या वर्णन करूं। वे करुणा के सागर हैं। ऐसा दयालु न कभी हुआ है, न कभी होगा।
जगाई और माधाई नामक दो मूर्ख पाषण्डियों ने ठीकरा फेंककर निताई के माथे पर मारा और खून की धारा बहा दी। फिर भी निताई ने अपनी दोनों बाहें फैलाकर मारने वाले उन दोनों को छाती से लगा लिया।
निताई ने गोलोक के दुर्लभ धन को उदारतापूर्वक बांट दिया, चाण्डालों तक को भी दिया। उन्होंने किसी की जाति-कुल का विचार नहीं किया। मुख से 'हरि हरि' कहते हुए वे नाचते-नाचते चलते रहे, उनकी दोनों आंखों से आंसुओं की धारा बहती रही।
वे स्वयं उन्मत्त हो गए और सारे जगत को भी उन्मत्त कर दिया। एक क्षण वे रोते, दूसरे क्षण मधुर मुस्कान भरकर हंसते। निताई प्रेमानन्द में इस प्रकार उन्मत्त हो गए, तो यह दीन पतित हरिदास उन्हें कैसे समझ सकता है?