निता इ गुण निधि शोभार अबधि
निताई प्रभु गुणों के भंडार हैं। वे शोभा और सौंदर्य के शिखर पर हैं। उनसे कैसा अमृत बहता है! उनके रूप का तेज उदय होते सूर्य को भी पराजित कर देता है। उन्हें देखने के बाद कोई भी स्थिर और शांत कैसे रह सकता है?
उनकी भुजाएँ सर्पों के समान उनके घुटनों तक पहुँचती हैं। वे अनुपम चंचल सुंदरता में लहराते रहते हैं। उनका मुख शरद ऋतु के चंद्रमा के समान है। उनकी कोमल मुस्कान अमृत की वर्षा करती है।
वे गौर! गौर! पुकारते हैं। उनका हृदय प्रेम से उमड़ रहा है। झूमते हुए वे मतवाले हाथी की तरह चलते हैं। उनके नेत्रों से आँसू बहते हैं, जैसे आनन्द की उफनती नदियाँ बह रही हों।
उनके चरण बड़ी कठिनाई से मिलते हैं। उन्हें छूने की आशा में देवता और मनुष्य चारों ओर से दौड़े आते हैं। आह! नरहरि दास के स्वामी की अजेय शक्ति से बलवान कलियुग भी डर से काँपता है।