निता इ मोर जीबन धन निता इ मोर गति
निताई मेरे जीवन का धन हैं, निताई ही मेरी सर्वोच्च गति हैं। निताई के बिना मेरी और कोई गति नहीं है।
इस संसार के निस्सार सुखों को मैं राख के ढेर के समान तुच्छ मानता हूं। नगर में भीख मांगकर जो मिलेगा वही खा लूंगा, पर निताई का सदा गुणगान करता रहूंगा।
जिस देश में निताई नहीं दिखेंगे, वहां मैं नहीं रहूंगा। निताई से विमुख रहने वाले लोगों का मुख भी मैं नहीं देखूंगा।
जो गंगाजल शिव अपने सिर पर धारण करते हैं, वह निताई के चरणों को धोकर आया हुआ जल है। जो निताई की भक्ति नहीं करता, वह दुःख पाकर मरता है।
लोचनदास कहते हैं, मेरे निताई प्रेम के कल्पतरु हैं। निताई दीनों के ठाकुर हैं, वे सारे जगत के गुरु हैं।