ओरे, वृन्दावनेर् नन्द दुलाल्
हे वृन्दावन के प्यारे! हे नन्द के दुलारे! हे ग्वालबालों के राजा! अपनी बाँसुरी पर फिर से वे तानें बजाओ, जो तुम्हारे सब सखाओं को बहुत प्यारी हैं।
हे गोपाल! तुमसे बिछुड़कर वृन्दावन के फूल खिलने की इच्छा ही खो बैठे हैं। फिर भी हम इस मधुवन को इसी प्रकार सजाकर रखते हैं, इस आशा में कि तुम अपने प्रेम-मिलन के लिये लौट आओगे।
श्रीदाम, सुदामा और तुम्हारे भाई बलराम तुम्हें पुकार रहे हैं, 'हे कन्हाई! लौट आओ!' बछड़ों को चराते और अपनी बाँसुरी बजाते हुए वे विनती करते हैं, 'हे भाई! घर लौट आओ!'
माता यशोदा तुम्हें पुकार रही हैं, 'हे गोपाल! तुम मेरे प्राण हो! हे माखनचोर, घर लौट आओ!' श्री राधा के हृदय में तुम्हारे प्रति दिव्य प्रेम यमुना नदी की भाँति निरन्तर बहता रहता है।
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ऑडियो के लिए आभार: इस्कॉन डिज़ायर ट्री। सभी भक्त गायकों की जय।