फाल्गुन पूर्णिमा निशि शची अङ्काकासे आसि
फाल्गुन मास की पूर्णिमा की रात को शची की गोद के आकाश में भगवान गौर का चन्द्रमा उदित हुआ। उस चन्द्रमा के चारों ओर भक्तों के तारे चमकने लगे।
उस चन्द्रमा के उदित होने पर पाप का भयानक, सर्वव्यापी अन्धकार बहुत दूर भगा दिया गया। उस चन्द्रमा को देखकर लोगों के सौभाग्य के कमल दिव्य प्रेम से खिल उठे। उनके हृदय आनन्द से मतवाले हो गए।
पापों की अमावस्या की रात से बहुत समय तक व्याकुल रहे भक्तों के चकोर पक्षियों ने अब आनन्द का कोलाहल मचा दिया। उस अमृत-चाँदनी को पीकर उन पक्षियों की भूख दूर भाग गई। सब शीतल आनन्द से भर गए।
दिव्य प्रेम की उस अमृत-चाँदनी को पीकर जीव आनन्द से भर गए। अपने पिछले बुरे कर्मों के कारण प्रेम दास ने उस अमृत-चाँदनी की एक किरण भी नहीं पी। इसी कारण वे अब धूल में लोट रहे हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- प्रेम दास
- पद
- 4