प्रभु नित्यानन्द आनन्देर कन्द
भगवान नित्यानन्द संपूर्ण आनंद के मूल हैं। पूर्व में वे रोहिणी के पुत्र बलराम थे। अब शुभ मुहूर्त में पद्मावती के गर्भ से जन्म लेकर वे कलियुग को परम शुभ बना देते हैं।
'जय! जय! जय!' की गूँज हाड़ाई पण्डित के घर को भर देती है। आनन्द में तैरते हुए दौड़ते एकचक्र के लोग शान्त और स्थिर नहीं रह पाते।
बालक नित्यानन्द के सुन्दर चन्द्रमुख से सूतिका-गृह शोभामय प्रकाश से भर जाता है। उनकी सुन्दर शोभा देखने की कितनी ही इच्छाएँ लोगों के मन में उठती हैं! वे बिना पलक झपकाए उन्हें निहारते रहते हैं।
देवगण आनंद से पुष्पों की वर्षा करते हैं। अदृश्य रूप से वे सुंदर भाव-भंगिमा में नाचते हैं। जब वाद्य और मृदंग ध्वनि करते हैं, धा धा धिउकी धिकी धेन्या ना, तब घनश्याम यह गीत गाते हैं।