प्रेमे मत्त महा बली चले दिग दिग दलि
वे बहुत बलवान हैं, प्रेम में उन्मत्त होकर कभी एक दिशा में, कभी दूसरी दिशा में चलते हैं। उनके कदमों का भार धरती सह नहीं पाती। उनका स्वरूप सुन्दर और मनोहर है, उनकी चाल धीमी है। क्या वे मद से मतवाले गजराज हैं?
प्रेमानन्द से उनके रोम-रोम खड़े हो जाते हैं, स्वर्ण-कदम्ब के केसर के समान। उनके नेत्रों से प्रेम के आंसुओं की धारा बहती है। वे नाचते हैं, गौर की महिमा का गान करते हैं। हृदय में बीते हुए दिन याद आते हैं, और वे 'भाई! भाई!' पुकार उठते हैं।
वे हुंकार भरते हैं, अपनी छाती पीटते हैं, सिंह के समान गरजते हैं। उनकी गर्जना सुनकर पाषण्डियों की छाती फटने लगती है। इस बार उनके हाथ में गदा नहीं है, उनके हाथ में लाल कमल है। वे महावीर हलधर बलराम हैं।
वे पतितों के एकमात्र मित्र हैं, वे रत्नों के भी रत्न-सागर हैं, अंधों को वे नेत्र देते हैं। केवल गुप्तदास ही ऐसे पतित रह गए हैं, जो अब भी अपने प्रभु की खोज नहीं करते।