शचीर आङ्गिना माझे भुबन=मोहन साजे
शची के आँगन में सब लोकों को मोह लेने वाले शिशु गौरचन्द्र घुटनों के बल सरकते हैं। एक क्षण वे अपनी माँ की उँगली पकड़कर चलते हैं। फिर वे घुटनों के बल सरकने लगते हैं, सरकते ही जाते हैं। कभी वे कुछ कदम चलते हैं, और फिर भूमि पर गिर पड़ते हैं।
घुटनों के बल सरकते समय उनके वक्ष पर सुन्दर बाघ-नख का हार इधर-उधर झूलता है। उनके चन्द्रमुख पर बिजली की चमक जैसी मुस्कान दमकती है। अब उनका एक-एक अंग धूल से सना है। माँ यह कैसे सह सकती हैं? वे उन्हें उठा लेती हैं।
वे व्याकुल हो जाते हैं। वे रोते हैं। बालक गौर माँ की गोद से छटपटाकर उतर पड़ते हैं। माँ उन्हें भूमि पर रख देती हैं। वे फिर घुटनों के बल सरकने लगते हैं। मुरारि मुस्कुराकर कहते हैं, यह माँ की गोद का कोई दूसरे बालकों जैसा नन्हा लड़का नहीं है। ये गौर वर्ण में स्वयं भगवान हरि हैं, वही भगवान हरि जो आगे चलकर संन्यासी बनेंगे।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- मुरारि
- पद
- 3