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“गौर आरती” के परिणाम

439 भजन · 566 पद भजन के शब्दों में · 472 पद अर्थ में

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श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1अर्थ
    सुनहरे रंग के गौर प्रभु प्रेम की लीलाओं का आनन्द लेते हैं। वे नदिया के नगरों को प्रेम की बाढ़ में तैरा देते हैं।
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श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1अर्थ
    गौरचन्द्र प्रेमभाव से अभिभूत हो जाते हैं। एक क्षण वे पुकार उठते हैं, "श्रीदामा! मेरे भाई!"
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श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1अर्थ
    रोते-रोते श्री गौर जप करते हैं। वे श्री कृष्ण के नाम का अमृत ऐसे चखते हैं जैसे निर्मल दिव्य चन्द्रमा पर अमृत की धाराएँ बहती हों।
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श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1अर्थ
    गौरचन्द्र की चन्द्रकिरण-सी शोभा को देखकर सुन्दर निताई भाव-विभोर हो उठते हैं। हृदय में कितना आनन्द उमड़ता है, वे स्थिर नहीं रह पाते। उनके रोम-रोम में नया पुलक छा जाता है।
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श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 2अर्थ
    प्रेमानन्द से उनके रोम-रोम खड़े हो जाते हैं, स्वर्ण-कदम्ब के केसर के समान। उनके नेत्रों से प्रेम के आंसुओं की धारा बहती है। वे नाचते हैं, गौर की महिमा का गान करते हैं। हृदय में बीते हुए दिन याद आते हैं, और वे 'भाई! भाई!' पुकार उठते हैं।
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श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 3अर्थ
    वे गौर! गौर! पुकारते हैं। उनका हृदय प्रेम से उमड़ रहा है। झूमते हुए वे मतवाले हाथी की तरह चलते हैं। उनके नेत्रों से आँसू बहते हैं, जैसे आनन्द की उफनती नदियाँ बह रही हों।
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श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1अर्थ
    गौर प्रभु के प्रेम में मतवाले निताई प्रभु अपनी करुणा भरी चितवन से अब सारे संसार को भी उसी प्रेम में मतवाला कर देते हैं।
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श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1अर्थ
    अहा! मेरे अद्वैत गोसाईं किस उमंग से अभिभूत हैं? उनके नेत्रों से अश्रु बहते हैं। अहा! उनके चन्द्र-सम मुख पर मधुर-मधुर मुस्कान बनी रहती है। वे 'गौर! गौर!' का जाप करते हैं।
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श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 2अर्थ
    उनके शरीर के रोम पुलकित हो उठते हैं। उनका हृदय प्रेम की उमंग से अभिभूत हो जाता है। बाहें उठाकर वे 'गौर! गौर!' कहते हुए नाचते हैं।
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श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 3अर्थ
    अपने मुख से वे भगवान गौर की महिमा का वर्णन करते हैं, ऐसी महिमा जो सारे लोकों को मोहित कर देती है। जिसे भी वे अपनी बाहों में भर लेते हैं, वह प्रेमानन्द में नाचने लगता है।
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श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 2अर्थ
    जिनकी उच्च ध्वनि से गौर प्रभु इस जगत में प्रकट हुए, वे अद्वैत प्रभु नित्यानन्द के साथ आनन्द में डूबे रहते हैं।
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गोविन्द दास कविराज

  • पद 5अर्थ
    कानों में चंचल मकर-कुण्डल हिलते हैं, उनका वस्त्र शरीर से सटा हुआ है। उनके दोनों चरण लाल कमल के समान हैं। गोविन्द दास उन्हें निहारकर यह आरती अर्पित करते हैं।
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गोविन्द दास कविराज

  • पद 2अर्थ
    यह स्वर्ण-गौरी वृन्दावन में अपनी सखियों के साथ खेला करती थी; पर अब विष-जैसी मीठी तुम्हारी दृष्टि ने उसका शरीर जला डाला है, उसी क्षण से वह साँवली और दुबली हो गई है।