श्री स्वप्न विलासामृताष्टक
श्रीमती राधारानी ने कहा: प्रियतम, स्वप्न में मैंने यहाँ यमुना जैसा एक नदी-तट देखा। वहाँ वृन्दावन की तरह बहुत से कुशल नर्तक थे। मृदंग और तरह-तरह के बाजे थे। वहाँ बिजली जैसा उज्ज्वल एक ब्राह्मण-रत्न था, जो सारे जगत को प्रेम के सागर में डाल रहा था।
कभी वह रोते हुए “हे कृष्ण!” पुकारता, कभी लम्बी साँस लेकर कहता “हे राधे, तुम कहाँ हो?” कभी वह धरती पर गिर पड़ता, कभी सारा धीरज खोकर उन्मत्त हो जाता, और कभी अपने प्रेमी संगियों के साथ आनन्द में नाचता। उसने घास के तिनके से लेकर ब्रह्मा तक, इस संसार के सब प्राणियों से ऊँचे स्वर में कृष्ण का नाम पुकरवाया।
उस पर दृष्टि डालते ही मेरी बुद्धि भ्रमित हो उठी। यदि वे मेरे प्रियतम हैं, तो मैं कहाँ हूँ? यदि वे स्वयं मैं ही हूँ, तो मेरा प्रियतम कहाँ है? यदि वे मेरे प्रियतम हैं, तो मैं कहाँ हूँ? निद्रा में जाते-जाते मेरा यह भ्रम और भी बढ़ता गया।
श्री कृष्ण ने कहा: हे जिज्ञासु सखी, जब मैंने तुम्हें नारायण और अपने अन्य रूप दिखाए थे, तब तुम्हें कोई आश्चर्य नहीं हुआ था। फिर यह ब्राह्मण तुम्हें क्यों चकित करता है? वह तुम्हें ऐसा भ्रमित क्यों कर देता है कि तुम पूछ बैठती हो, “यह कौन है?”
अपनी प्रियतमा से यह कहकर मुस्कुराते हुए प्रियतम कृष्ण ने अपनी कौस्तुभ मणि को छुआ। प्रभु का मन समझकर वह मणि चमक उठी और उसने वही सब लीलाएँ तथा वे सब चर-अचर प्राणी दिखा दिए, जिन्हें राधा ने स्वप्न में देखा था।
श्रीमती राधारानी ने क्षणभर विचार करने के बाद कहा: प्रियतम, अब मैं जान गई कि आपके हृदय में क्या है, जिसके कारण आप मुस्कुरा रहे हैं। आप ही वे हैं। आपने जो कहा और जो सोचा, वह अब मुझे स्पष्ट हो गया है, इसलिए मुझे लगता है कि मैं भी वही हूँ।
हमें अत्यन्त प्रिय इस कौस्तुभ मणि को इस प्रकार चमकाकर आपने स्वयं को समस्त जीवों के सम्मुख प्रकट किया है। आप अपनी ही दिव्य शक्ति से अवतरित होंगे, अपनी लीलाएँ दिखाएँगे, सबको शिक्षा देंगे, और पुनः संसार को प्रेम के सागर में डुबा देंगे।
व्रजराज की सभा में वेदों के ज्ञाता विद्वान गर्गाचार्य ने कहा था कि आप पीत वर्ण में प्रकट होंगे। उन्होंने असत्य नहीं कहा था। मेरा यह स्वप्न सत्य है, यह भ्रम नहीं है। इस स्वप्न में मैंने आपको प्रत्यक्ष देखा है।
यदि पाठक के मन का भ्रमर इस “स्वप्न-विलासामृत” का अमृत पिए, तो वह बुद्धिमान पाठक भौतिक संदेह के स्वप्न से तुरन्त जाग उठेगा। ऐसा पाठक भगवान चैतन्य महाप्रभु को पा लेगा। वह प्रेम के सागर में क्रीड़ा करेगा। उसे वृन्दावन के राजा की अनुपम कृपा मिलेगी।