श्रीबास अङ्गने बिनोद बन्धाने
श्रीवास के सुन्दर आँगन में नित्यानन्द राय नाचते हैं। मनुष्य और देवता, स्त्री और पुरुष, सब उन्हें देखने दौड़ पड़ते हैं।
भक्तों का मण्डल मंगल गीत गाता है। खोल और करताल बज रहे हैं। इनके बीच उन्मत्त निताई नाचते हैं। वे प्रेम के भाव में मतवाले हैं।
उनकी सुन्दर भुजाएँ सोने के खम्भों को भी हरा देती हैं। उनकी पतली कमर सिंह की कमर को भी हरा देती है। उनका मुख चन्द्रमा है, उनके नेत्र कमल हैं। उनका रूप कामदेव को भी मोहित कर देता है।
वे बार-बार गरजते हैं और निरन्तर उछल-कूद करते हैं। वे मल्ल के समान वेश धारण कर नाचते हैं। उनके अरुण नेत्रों से प्रेम की वर्षा होकर सारी पृथ्वी को सींच देती है।
अवधूतों के चन्द्रमा निताई प्रभु पृथ्वी पर प्रेम के आँसुओं की वर्षा करते हैं। चौदह लोकों के स्त्री-पुरुष उन्हें समझ नहीं पाते। उनके अद्भुत सुन्दर रूप को देख-देखकर वे रो पड़ते हैं।
निताई का प्रेम-भाव देखकर शान्तिपुर के स्वामी अद्वैत आचार्य बार-बार गरज उठते हैं। उदार श्रीवास पण्डित निताई के चरण पकड़कर रोने लगते हैं।
मुकुन्द आनन्द से रो पड़ते हैं। विभोर होकर वे गदाधर को गले लगा लेते हैं। अभिराम ठाकुर की आँखों से प्रेम के आँसू बहते हैं। वे 'हरि! हरि!' पुकारते हैं।
सब लोग प्रेम-रस में तैर रहे हैं। किसी को पता नहीं रहता कि दिन है या रात। शंकर घोष दास निताई प्रभु के चरण-कमलों को पाने की आस रखते हैं।