महा भुज नाचत चैतन्य राय
महा-भुज नाचत चैतन्य राय
श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन से।
इस संग्रह में श्री नित्यानन्द प्रभु वाले अध्याय के बाद सबसे बड़ा अध्याय। इसके तैंतीस भजन संकीर्तन, यानी उस सामूहिक कीर्तन, में चैतन्य महाप्रभु के अपने भाव-विभोर नृत्य का वर्णन करते हैं, जिसका प्रचार स्वयं उन्होंने किया। इनमें नृत्य में उठी उनकी भुजाओं से लेकर चलते समय उनके शरीर की स्वर्णिम आभा तक का वर्णन है, जो इस पूरी शैली का बार-बार लौटने वाला मुख्य दृश्य-चित्र है।
34 भजन
महा-भुज नाचत चैतन्य राय
नाचत नीके गौर-बर रतन
देख शची-नन्दन, जगत जीबन धन, अनुखण प्रेम-धन
गोरा नाचे प्रेम बिनोदिया
नाचये चैतन्य चिन्तामणि
आरे मोर नाचत गौर-किशोर
भाबे भरल हेम तनु अनुपम रे, अहर्-निशि निज-रसे भोर
नाचये गौराङ्ग पहुं सहचर सङ्ग
नाचत गौर पूरब रसे भोर
नृत्यत गौरचन्द्र जन-रञ्जन, नित्यानन्द बिपद-भय-भञ्जन
आजु कि आनन्द सङ्कीर्तने
नाचे गौराङ्गचान्द बिभोर भाबेते
नाचे शचीर दुलाल रङ्गे
नाचत गौरचन्द्र नट-भूप
नाचत गौर निखिल नट-पण्डित निरुपम भङ्गी मदन-मद हर-इ
आजु कि आनन्द नदीया-नगरे, जगा-इ माधा-इ दोहे देखिबारे
नाचत गौर नटन पण्डित-बर
बलि-कलि-मत्त-मतङ्गज-मरदन, गौर-सिंह नाचत नदीयाय
नाचत गौर परम सुख-सदना
नाचत शची-तनय गौर-माधुरी मन मोहे
किबा खोल करताल बाजे
भुबन-मोहन गोराचान्द
आजु गोरा नगर-कीर्तने
शचीर दुलाल गोरा नाचे
नाचे गोरा गुण-मणि केबल प्रेमेर खनि
गोरा बड दयार ठाकुर
नाचत नट-बर गौर-किशोर
चोदिगे गोबिन्द-ध्वनि शुनि पहुं हासे
चौदिके गोबिन्द-ध्वनि शुनि पहुं हासे
नदीया-आकाशे सङ्कीर्तन-मेघ साजे
सङ्कीर्तन छले गौर निता-इ
नबद्वीपे शुनि सिंह-नाद
हरि हरि मङ्गल भरत क्षिति-मण्डल
श्रीबास-अङ्गने बिनोद बन्धाने