Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

श्रील नरोत्तम प्रभोरष्टक

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श्री-कृष्ण-नामामृत-वर्षि-वक्त्र- चन्द्र-प्रभा-ध्वस्त-तमो-भराय गौराङ्गदेवानुचराय तस्मै नमो नमः श्रील-नरोत्तमाय
अर्थ

मैं श्रील नरोत्तम दास ठाकुर को सादर प्रणाम करता हूँ, जो गौरांगदेव के सच्चे अनुगामी हैं। उनका मुखचन्द्र कृष्ण-नाम के अमृत की वर्षा करता है, और उसकी कान्ति अज्ञान के अन्धकार को मिटा देती है।

सङ्कीर्तनानन्दज-मन्द-हास्य दन्त-द्युति-द्योतित-दिङ्मुखाय स्वेदाश्रु-धारा-स्नपिताय तस्मै नमो नमः श्रील-नरोत्तमाय
अर्थ

मैं श्रील नरोत्तम दास ठाकुर को सादर प्रणाम करता हूँ। कीर्तन के आनन्द में वे पसीने और आँसुओं की धाराओं से नहा जाते थे, और उनकी मन्द मुस्कान और दाँतों की चमक सब दिशाओं को उजाला कर देती थी।

मृदङ्ग-नाम-श्रुति-मात्र-चञ्चत्- पदाम्बुज-द्वन्द्व-मनोहराय सद्यः समुद्यत्-पुलकाय तस्मै नमो नमः श्रील-नरोत्तमाय
अर्थ

मैं श्रील नरोत्तम दास ठाकुर को सादर प्रणाम करता हूँ। मृदंग और नाम की ध्वनि सुनते ही उनके दोनों मनोहर चरण-कमल थिरकने लगते थे, और तुरन्त उनका रोम-रोम पुलकित हो उठता था।

गन्धर्व-गर्व-क्षपण-स्वलास्य- विस्मापिताशेष-कृति-व्रजाय स्व-सृष्ट-गान-प्रथिताय तस्मै नमो नमः श्रील-नरोत्तमाय
अर्थ

मैं श्रील नरोत्तम दास ठाकुर को सादर प्रणाम करता हूँ। उनके नृत्य ने गन्धर्वों के अभिमान को चूर कर दिया। उनकी भक्ति-क्रियाओं ने सबको विस्मित कर दिया, और उनके रचित गीतों ने उन्हें विख्यात कर दिया।

आनन्द-मूर्च्छावनि-पात-भात- धूलि-भरालङ्कृत-विग्रहाय यद्-दर्शनं भाग्य-भरेण तस्मै नमो नमः श्रील-नरोत्तमाय
अर्थ

मैं श्रील नरोत्तम दास ठाकुर को सादर प्रणाम करता हूँ। वे कभी-कभी आनन्द में मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ते थे, और उनका शरीर धूल से ढक जाता था। केवल भाग्यशाली जन ही उन्हें उस अवस्था में देख पाते थे।

स्थले स्थले यस्य कृपा-प्रभाभिः कृष्णान्य-तृष्णा जन-संहतीनाम् निर्मूलिता एव भवन्ति तस्मै नमो नमः श्रील-नरोत्तमाय
अर्थ

मैं श्रील नरोत्तम दास ठाकुर को सादर प्रणाम करता हूँ। स्थान-स्थान पर उनकी कृपा के तेज ने लोगों की कृष्ण से भिन्न किसी भी वस्तु की तृष्णा को समूल नष्ट कर दिया।

यद्-भक्ति-निष्ठोपल-रेखिकेव स्पर्शः पुनः स्पर्शमणीव यस्य प्रामाण्यम् एवं श्रुतिवद् यदीयं तस्मै नमः श्रील-नरोत्तमाय
अर्थ

मैं श्रील नरोत्तम दास ठाकुर को सादर प्रणाम करता हूँ। कृष्ण-भक्ति में उनकी निष्ठा पत्थर पर खिंची लकीर जैसी अमिट है। उनका स्पर्श पारस-मणि जैसा है, और उनके वचन वेदों की तरह प्रमाण हैं।

मूर्तैव भक्तिः किम् अयं किम् एष वैराग्य-सारस् तनुमान् नृ-लोके सम्भाव्यते यः कृतिभिः सदैव तस्मै नमः श्रील नरोत्तमाय
अर्थ

मैं श्रील नरोत्तम दास ठाकुर को सादर प्रणाम करता हूँ। भक्तजन सदा यह सोचकर विस्मित होते हैं: क्या वे भक्ति के साक्षात् स्वरूप हैं? क्या वे वैराग्य का सार हैं, जो इस रूप में मनुष्य-लोक में अवतरित हुए हैं?

राजन्-मृदङ्ग-करताल-कलाभिरामं गौराङ्ग-गान-मधु-पान-भराभिरामम् श्रीमन्-नरोत्तम-पदाम्बुज-मञ्जु-नृत्यं भृत्यं कृतार्थयतु मां फलितेष्ट-कृत्यम्
अर्थ

श्री नरोत्तम के चरण-कमलों का सुन्दर नृत्य, जो करताल और मृदंग की मधुर ध्वनि से मनोहर है, और गौरांग के गीतों का मधु पीकर और भी सुन्दर हो उठता है, वह मुझ सेवक की सारी आध्यात्मिक कामनाएँ पूरी करे।