आजु शुभ क्षणे निता इ चान्देर
इस शुभ घड़ी में निताईचंद्र प्रभु के अधिवास की शोभा निराली है। निताई प्रभु का वेश अनुपम है। उनका माथा सुंदर और उज्ज्वल है। उनके अंग जगमगा रहे हैं।
संध्या में चमकता निताई प्रभु के मुख का चंद्रमा कितने ही सैकड़ों कामदेवों का गर्व हर लेता है! कमल की पंखुड़ियों जैसे उनके सुंदर, चंचल नेत्र कितनी ही मनोहर चितवनें डालते हैं। उनकी चितवन देखकर कोई भी धीरज नहीं रख पाता।
उनके चारों ओर ब्राह्मणगण वेदों का उच्चारण करते हैं। निताई प्रभु के सुंदर रूप को निहारकर उनके हृदय में अपार आनंद भर जाता है। आनंद से भरे हृदय के साथ स्त्रियाँ "उलु-लुलुलु!" की ध्वनि करती हैं।
अनेक वाद्य-यंत्र ऐसा तुमुल संगीत बजाते हैं जो आकाश को भेद देता है। नर्तकगण नृत्य करते हैं। उनकी गतियाँ कितनी मधुर हैं! सारा संसार "जय! जय!" की ध्वनि से भर जाता है। आनंदित घनश्याम दास ये वचन कहते हैं।