भाबे गर गर निता इ सुन्दर
गौरचन्द्र की चन्द्रकिरण-सी शोभा को देखकर सुन्दर निताई भाव-विभोर हो उठते हैं। हृदय में कितना आनन्द उमड़ता है, वे स्थिर नहीं रह पाते। उनके रोम-रोम में नया पुलक छा जाता है।
वे प्रेम के उन्माद में मत्त हो गए हैं। कभी सिंह के समान गरजते हैं, कभी धरती पर लोटने लगते हैं। कभी लंबी साँस भरते हैं, कभी खुलकर हँसते हैं। कभी उनके वस्त्र अस्त-व्यस्त हो जाते हैं, कभी वे अपने ही नेत्रों से बहते आँसुओं में तैरने लगते हैं।
कभी वे उछल पड़ते हैं, कभी उनका शरीर कांपने लगता है। कभी वे इतने उन्मत्त हो जाते हैं कि कोई उन्हें थाम नहीं पाता। कभी वे शांत और स्थिर होकर विश्वम्भर को अपनी छाती से लगा लेते हैं।
विश्वम्भर को गले लगाकर निताई अपने नेत्रों से बहते आँसुओं में दोनों को तैरा देते हैं। यही निताई के प्रेम की रीति है। नरहरि कहते हैं, श्रीवास आदि चारों भाई पास खड़े रोते हैं, उनमें से कोई भी धीरज नहीं रख पाता।