गुरुदेवे व्रज वने व्रज भूमि
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2 रिकॉर्डिंगगुरुदेव, श्री वृंदावन, वृंदावनवासी जन, शुद्ध वैष्णव, ब्राह्मण-गण, इष्ट-मंत्र, हरि-नाम, तथा युगल की सेवा की चाह: इन आठों की मैं अत्यंत श्रद्धा से आराधना करता हूँ।
हे मन, तुम्हारे चरण पकड़कर मैं यह विनती करता हूँ। अब हमने यह सार समझ लिया है कि कृष्ण की भक्ति के बिना जीव का यह संसार-भ्रम कभी नहीं मिटता।
कर्म, ज्ञान, तप और योग, ये सब वस्तुतः कर्म-भोग ही हैं। इनसे कोई भी कर्म-बंधन से मुक्त नहीं हो सकता। हे भाई, इन सबको त्यागकर श्रद्धा-देवी की महिमा गाओ, जिनकी कृपा से ही शुद्ध भक्ति प्राप्त होती है।
हे मन, अपना दम्भ सदा के लिए छोड़ दो। उन आठ तत्त्वों का स्मरण करो और निष्कपट हृदय से उनमें अनुराग रखो। उसी अनुराग की कामना करते हुए यह भक्तिविनोद श्री दास गोस्वामी के चरणों में प्रार्थना करता है।
ऑडियो के लिए आभार: इस्कॉन डिज़ायर ट्री, इस्कॉन भक्त। सभी भक्त गायकों की जय।