हरि हरि बिफले जनम
हरि हरि! मैंने अपना जीवन व्यर्थ बिता दिया। यह दुर्लभ मानव-जन्म पाकर भी मैंने राधा-कृष्ण की भक्ति नहीं की, और जान-बूझकर विष पी लिया।
गोलोक का प्रेम-धन ही हरि-नाम संकीर्तन है, फिर इसके लिए मेरे मन में रुचि क्यों नहीं जगी? संसार की विष-अग्नि में मेरा हृदय दिन-रात जलता रहता है, और इसे शीतल करने का कोई उपाय मैंने नहीं किया।
व्रजेन्द्र-नन्दन कृष्ण ही शची-सुत बने, और बलराम निताई बने। जितने भी दीन-हीन जन थे, उन सबका हरि-नाम ने उद्धार किया, इसके साक्षी हैं जगाई-माधाई।
हा हा प्रभु! हे नन्द-सुत, वृषभानु-नन्दिनी के साथ, अब मुझ पर कृपा करें। नरोत्तम दास कहते हैं, हे प्रभु, अपने लाल-लाल चरणों से मुझे दूर मत धकेलिए, आपके सिवा मेरा और कौन है?
इस भजन के बारे में
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- नरोत्तम दास ठाकुर · जीवनी पढ़ें
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ऑडियो के लिए आभार: इस्कॉन डिज़ायर ट्री, इस्कॉन भक्त। सभी भक्त गायकों की जय।