कुबेर पण्डित अति करषित
नवजात पुत्र का मुख देखकर कुबेर पण्डित अत्यन्त प्रसन्न हुए। जैसे-जैसे वे जातकर्म आदि धर्मविधियाँ करते गए, उनके हृदय का आनन्द बढ़ता गया।
उस पुत्र में सभी शुभ लक्षण थे। उनका वर्ण स्वर्ण के समान था। वे सुवर्ण-कमल के समान शोभायमान थे। उनकी सुन्दर भुजाएँ घुटनों तक पहुँचती थीं। संसार के लोगों के हृदय उन्हें पाने के लिए तरसते थे।
उनकी नाभि बहुत गहरी थी। वे परम सुन्दर थे। उनके नेत्रों ने कमल के फूलों को भी हरा दिया। उनके लाल चरणों ने कितने ही दर्पणों और चन्द्रकान्त मणियों को भी हरा दिया।
महापुरुष के मनोहर लक्षणों को देखकर सभी आश्चर्यचकित हो गए। हर कोई सोचने लगा, "यह बालक समस्त लोकों का उद्धार करेगा।"
नवजात शिशु का मुख देखकर गाँव की स्त्रियाँ आनन्द-सागर में तैरने लगीं। उनका हृदय शान्त नहीं रहता था। वे बार-बार आकर देखती थीं। वे बिना पलक झपकाए निहारती रहती थीं।
माता की अनुपस्थिति में स्त्रियाँ आपस में कहती थीं, "ऐसा पुत्र पाकर वह माता सौभाग्य के शिखर पर पहुँच गई हैं। हम उनकी तुलना किससे करें? इस संसार में उनके समान और कौन है?"
भाव-विभोर होकर गद्गद वाणी में सब स्त्रियाँ इस प्रकार कहती थीं। वे जानती थीं कि यह बालक समस्त लोकों का उद्धार करेगा। वैष्णव दास अद्वैत प्रभु का संग पाने की आकांक्षा रखते हैं।
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