फाल्गुन पूर्णिमा शशी राहु चन्द्रेरे परशि
फाल्गुन पूर्णिमा के समय राहु को चन्द्रमा का स्पर्श करते देखकर सबने पुकारा, “हरिबोल!” कुछ लोगों ने मृदंग बजाए। दूसरों ने बाँसुरियाँ या घड़ियाल बजाए। घण्टों और शंखों की ध्वनि से बड़ा कोलाहल मच गया।
शुभ दिन और शुभ क्षण की राह देखकर परम पुरुषोत्तम भगवान ने शची के घर में जन्म लिया। देवता अपनी असली पहचान छिपाकर देखने आए। अभी उन्होंने देखा नहीं था, पर कोलाहल सुना था।
कोलाहल सुनकर नदिया के आनन्दित स्त्री-पुरुष देखने के लिए दौड़ पड़े। बालक के सामने खड़े होकर उनके हृदय लालसा से भर गए। उनके मन में आनन्द समा गया। उनकी आँखें उस नन्हे बालक के दर्शन से भर गईं।
उस बालक को देखकर भक्त आनन्द से भर गए। अपने हृदय में वे जान गए कि अब उनका उद्धार होगा। केवल दुष्ट हृदय वाले संकर्षण दास को ही भगवान गौरांग से प्रेम नहीं है। हे शची के पुत्र, फिर भी आप उस पर दया कीजिए।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- संकर्षण दास
- पद
- 4