प्रीति प्रावृट् समारम्भे
प्रेम की वर्षा-ऋतु के आरम्भ में, भावमग्न गोपियाँ कृष्ण के गुणों का गान करते-करते उन्मत्त हो उठीं; वे हरि की प्रिय थीं।
श्री कृष्ण की बाँसुरी के स्वर से व्याकुल होकर, कृष्ण को पाने की इच्छा से उन्होंने व्रज में महादेवी योगमाया की आराधना की।
जिनके हृदय में कृष्ण-सेवा की इच्छा अत्यन्त प्रबल होती है, उन्हें अपने से अथवा किसी और से कुछ भी छिपाने की आवश्यकता नहीं रहती।
यही शिक्षा देने के लिए भगवान् कृष्ण ने उनके वस्त्र हर लिए और उनके अनावृत (खुले) मन को देखा, जो रति अर्थात् प्रेमासक्ति का निर्दोष निवास-स्थान है।
जगत् के स्वामी ने यज्ञ करते हुए ब्राह्मणों से भोजन माँगा, परन्तु अपने वर्ण के अभिमान में डूबे उन ब्राह्मणों ने कुछ भी नहीं दिया।
वेद-वाद में रत, सकाम कर्म और चिन्तनात्मक ज्ञान में लीन, सदा कर्मकाण्ड के विधानों से बँधे रहने वाले ऐसे ब्राह्मण वस्तुतः कृष्ण के प्रति समर्पित कैसे हो सकते थे?
किन्तु उनकी पत्नियों ने उसी समय वन में श्री कृष्ण के पास आकर परमात्मा कृष्ण को अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया।
इससे यह सत्य प्रकट हुआ कि श्री कृष्ण के प्रेम की सम्पदा में समस्त जीव समान भाव से देखे जाते हैं, वहाँ जाति या जन्म का कोई मूल्य नहीं रहता।
मनुष्यों का वर्णों में विभाजन केवल एक सामाजिक व्यवस्था है; जो कृष्ण के लिए वर्णाश्रम-धर्म का त्याग करता है, उसे कोई दोष नहीं लगता।
सकाम कर्म के प्रतीक इन्द्र के निमित्त होने वाले यज्ञोत्सव का निषेध करके, हरि ने गोकुल को उनकी प्रलयंकारी वर्षा से बचाया।
इससे यह सत्य विदित हुआ कि जिसने कृष्ण-प्रेम प्राप्त कर लिया है, उसे विहित कर्मों को त्याग देने पर भी सम्पूर्ण प्रलय का भी भय नहीं रहता।
जिनका उद्धार कृष्ण करते हैं, उनका कोई संहारक नहीं होता; कर्मकाण्ड के विधानों का बल उन पर नहीं चलता, फिर भक्तों के लिए बन्धन कहाँ रह जाता है?
विश्वास और श्रद्धा के इस मनोहर प्रसंग में मानो चेतना की प्रवाहमयी नदी बह रही है; उसी में क्रीड़ा करते हुए हरि ने अपने डूबते पिता को उससे बचाया।
हरि ने गोपों को अपना धाम वैकुण्ठ दिखाया; निश्चय ही ऐश्वर्य सदा कृष्ण-तत्त्व में अन्तर्निहित रहता है।
नित्यसिद्ध जीवों और उनके अनुगतों के भी प्रिय कृष्ण ने रासलीला की, जो दिव्य प्रेम के तत्त्व को प्रकट करती है।
अन्तर्धान होकर विरह उत्पन्न करते हुए परम उत्कण्ठा बढ़ाकर, हरि ने कृपापूर्वक गोपियों के साथ पुनः रास-मण्डल में नृत्य किया।
जिस प्रकार इस भौतिक ब्रह्माण्ड में सूर्य सहित परिभ्रमण करने वाले ग्रह ध्रुव तारे के आकर्षण से अपनी-अपनी कक्षा में घूमते हैं,
उसी प्रकार आध्यात्मिक जगत् में जीव कृष्ण के आकर्षण-बल से नित्य परिभ्रमण करते रहते हैं, और श्री कृष्ण उस परिभ्रमण के केन्द्र में स्थित रहते हैं।
इस महान् रासलीला में एकमात्र कृष्ण ही भोक्ता हैं; वहाँ उपस्थित अन्य सभी स्त्री-रूप में भोग्य की स्थिति में हैं।
वहाँ, रासलीला के मध्य, परम पूजनीया ह्लादिनी शक्ति, जो कृष्ण को प्रकाशित करती हैं, स्वयं राधिका हैं, जो अपनी सखियों से घिरी अनेक भावों में स्थित हैं।
इस महान् रासलीला के अन्त में स्वाभाविक रूप से यमुना में जल-क्रीड़ा होती है, जिसका जल भक्तों के लिए साक्षात् द्रवीभूत चेतना ही है।
मुक्ति-रूपी सर्प द्वारा ग्रसे गए नन्द को तब कृष्ण ने छुड़ाया; और इससे पूर्व अपनी कीर्ति पर गर्वित, अत्यन्त उद्दण्ड शंखचूड़ का वध किया गया था।
मथुरा जाने की इच्छा रखने वाले कंस-शत्रु कृष्ण ने घोड़े का रूप धारण किए, अपने राज्य के अहंकार से उन्मत्त केशी दैत्य का वध किया।
होने वाली घटनाओं को घटित कराने वाले अक्रूर हरि को मथुरा ले आए; और हरि ने मल्लों का वध करने के बाद कंस को उसके छोटे भाई सहित मार गिराया।
नास्तिक कंस के मारे जाने पर कृष्ण ने कंस के ही पिता, स्वातन्त्र्य-स्वरूप उग्रसेन को पृथ्वी का पालक बनाया।
कंस की दोनों पत्नियाँ अपने पिता, कर्मकाण्ड-स्वरूप मगधराज जरासन्ध के पास गईं और उसे अपनी विधवावस्था की सूचना दी।
यह सुनकर मगधराज ने अपनी सेनाओं सहित मथुरा नगरी में सत्रह महायुद्ध किए।
वह भी हरि द्वारा पराजित हुआ; किन्तु जब अठारहवें युद्ध में उसने आकर मथुरा को घेर लिया, तब कृष्ण अपनी नगरी द्वारका चले गए।
मथुरा में रहते हुए कृष्ण ने अपने गुरु के आश्रम में शरण ली, वहाँ समस्त शास्त्रों का अध्ययन किया और फिर अपने गुरु के पुत्र को जीवित कर दिया।
स्वतःसिद्ध कृष्ण के लिए ज्ञान कभी साध्य वस्तु नहीं होता; केवल मनुष्यों के चित्त में ही ऐसे भावों का क्रमशः उदय होता है।
कामी पुरुषों की कृष्ण के प्रति आसक्ति भी अशुद्धि से मिली हुई आसक्ति है; किन्तु वही आसक्ति क्रमशः यहाँ पूर्णतः शुद्ध प्रेम बन जाती है।
कुब्जा के प्रेम में यही मंगलमय सत्य दर्शाया गया; और उद्धव व्रज-भाव में सम्यक् शिक्षा पाने के लिए गोकुल गए।
पाण्डव धर्म की शाखा के रूप में स्मरण किए जाते हैं और कौरव उसके विपरीत; इसीलिए कृष्ण पाण्डवों के बन्धु और उनके कुल के रक्षक बने।
भगवान् ने अक्रूर को धर्म के कल्याण हेतु और पापियों का उद्धार करने की इच्छा से अपने दूत के रूप में हस्तिनापुर भेजा।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- पद
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