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“जय राधा माधव” के परिणाम

536 भजन · 902 पद भजन के शब्दों में · 608 पद अर्थ में

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नरोत्तम दास ठाकुर · प्रार्थना

  • पद 4भजन
    पाब राधा-कृष्ण-पा घुचिबे मनेर घा
    दूरे जाबे ए-सब विकल
    नरोत्तम दासे कय एइ वाञ्च्छा सिद्धि हय
    देह प्राण सफल सकल
  • पद 4अर्थ
    राधा-कृष्ण के चरण पाकर मेरे मन के सारे घाव मिट जाएँगे, और यह सब दुःख दूर हो जाएगा। नरोत्तम दास कहते हैं कि इस प्रकार मेरी सारी कामनाएँ पूर्ण होंगी, और यह देह और प्राण सर्वथा सफल हो जाएँगे।
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नरोत्तम दास ठाकुर · प्रार्थना

  • पद 2भजन
    श्याम-घन बरिखये प्रेम-सुधा-धार
    कोरे रङ्गिणी राधा बिजुरी-सँचार
  • पद 2अर्थ
    श्याम-घन प्रेम-अमृत की धारा बरसा रहा है, और उल्लासित राधा उसकी गोद में बिजली बनकर विचर रही हैं।
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स्तवामृत-लहरी

  • पद 3भजन
    सदोल्लसद्-भगवद्-अनुरक्तो
    यः कृष्ण-राधा-श्रवणादि-भक्त्या
    अयातयामी-कृत-सर्व-यामस्
    तं लोकनाथं प्रभुम् आश्रयामः
  • पद 3अर्थ
    हम लोकनाथ प्रभु की शरण लेते हैं, जो प्रेम से दमकते थे। वे सदा भक्ति में लगे रहते थे: श्री श्री राधा-कृष्ण के विषय में सुनते थे और अनेक प्रकार से उनकी सेवा करते थे।
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स्तवामृत-लहरी

  • पद 7भजन
    अधिधरम् अनुरागं माधवेन्द्रस्य तन्वंस्
    तद्-अमल-हृदयोत्थं प्रेम-सेवां विवृण्वन्
    प्रकटित-निज-शक्त्या वल्लभाचार्य-भक्त्या
    स्फुरतु हृदि स एव श्रील-गोपालदेवः
  • पद 7अर्थ
    जिन्होंने अपनी भक्ति-शक्ति से माधवेन्द्र पुरी के शुद्ध हृदय में प्रेम-भक्ति की सेवा प्रतिष्ठित की, वे श्रील गोपालदेव मेरे हृदय में प्रकट हों।
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स्तवामृत-लहरी

  • पद 4भजन
    यदा तदा माधव यत्र यत्र
    गायन्ति ये ये तव नाम-लीलाः
    तत्रैव कर्णायुत-धार्यमाणास्
    तास् ते सुधा नित्यम् अहं धयानि
  • पद 4अर्थ
    हे माधव, जब भी, जहाँ भी, और जो कोई भी आपके नामों और लीलाओं का गान करे, वहाँ मैं करोड़ों कानों से नित्य आपके उस अमृत का पान करता रहूँ।
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श्री क्षणदा-गीत-चिन्तामणि

  • पद 6भजन
    नाचत निता-इ गौर-रसे
    बञ्चित रहल राधाबल्लभ दासे
  • पद 6अर्थ
    गौर-रस का आस्वादन करते हुए निताई नाचते हैं। केवल राधावल्लभ दास इस प्रेम-रस के आस्वादन से वंचित रह गये।
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श्री क्षणदा-गीत-चिन्तामणि

  • पद 5भजन
    ताहा करि करि भुज-युग तुलि
    बले हरि हरि बोल
    राधा राधा बलि डाके उच्च करि
    दे-इ गदाधर कोल
  • पद 5अर्थ
    'हा हा' पुकारते हुए वे अपनी बाहें उठाते हैं। वे 'हरि! हरि!' बोलते हैं। ऊँचे स्वर में 'राधा! राधा!' पुकारते हुए वे गदाधर को अपने वक्ष से लगा लेते हैं।
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श्री क्षणदा-गीत-चिन्तामणि

  • पद 1भजन
    गौराङ्ग ठेकिल पके
    भाबेर आबेशे राधा राधा बलि डाके
  • पद 1अर्थ
    गौरांग मण्डल बनाकर नाचते हैं। भाव के आवेश में वे 'राधा! राधा!' पुकारते हैं।
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श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 2भजन
    शोभा निरुपम भणतन आयत, बेष्टित परिकर गुण-गण गायत
    मधुर मधुर मृदु मर्दल बायत, धाधा धिगि धिगि धिकट धिलङ्ग
    गण सह सुर-गण गगन-पन्थ-गत, घन घन सरस कुसुम बर बरषत
    जय जय जय ध्वनि भुबन बियापत, नरहरि कहब कि प्रेम-तरङ्ग
  • पद 2अर्थ
    …धिगि धिगि धिकट धिलंग!' आकाश-मार्ग में इकट्ठे होकर देवता और उनके साथी फूल बरसाते हैं। 'जय! जय! जय!' की ध्वनि सब लोकों में भर जाती है। क्या नरहरि कभी प्रेम की उन तरंगों का वर्णन कर पाएँगे, जो उस समय हर ओर उमड़ पड़ी थीं?…
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श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    बलि-कलि-मत्त-मतङ्गज-मरदन, गौर-सिंह नाचत नदीयाय
    जय जय रब सब भुबन बियापित, निखिल लोक मिलि चौधिके धाय
  • पद 1अर्थ
    कलियुग के बलवान उन्मत्त गजराज को कुचलते हुए नदिया के सिंह भगवान गौर नृत्य करते हैं। जय! जय! की ध्वनि से सब लोक भर जाते हैं। चारों दिशाओं से सभी उनकी ओर दौड़ते हैं।
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श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 5भजन
    उनमत भकत फिरये चारि पाशे
    जय जय कल-रब ए भूमि आकाशे
  • पद 5अर्थ
    आनन्द से उन्मत्त भक्तगण उनके चारों ओर नृत्य करते हैं। पृथ्वी और आकाश "जय जय" की ध्वनि से गूँज उठते हैं।
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श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 6भजन
    जय-ध्वनि ए भूमि आकाश
    मातिल पामर हीन नरहरि दास
  • पद 6अर्थ
    पृथ्वी और आकाश "जय" की ध्वनि से गूँज उठते हैं। पतित और तुच्छ नरहरि दास भी आनन्द से उन्मत्त हो जाते हैं।
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श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 4भजन
    राधा राधा बलि पहुं पडे मूरछिया
    शिबानन्द कान्दे पहुंर भाब ना बुझिया
  • पद 4अर्थ
    "राधा! राधा!" कहते हुए वे मूर्च्छित हो जाते हैं। शिवानन्द रोते हैं। प्रभु के इन भावों को शिवानन्द तनिक भी नहीं समझ पाते।
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श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 4भजन
    कहे दास नरहरि आरे मोर गौर-हरि
    राधार पिरीते हैल हेन
    ऐछन करिय चिते कलि-युग उद्धारिते
    बञ्चित ह-इनु मुञि केन
  • पद 4अर्थ
    नरहरि दास कहते हैं, मेरे प्रभु गौर-हरि ने वही प्रेम अनुभव किया जो राधा अनुभव करती हैं। हृदय में यह प्रेम धारण करके उन्होंने कलियुग का उद्धार किया। फिर भी मुझ नरहरि का उद्धार क्यों नहीं हुआ? मुझे क्यों वंचित रखा गया?
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श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 8भजन
    गौरक शुनि इह भाष
    भण राधामोहन दास
  • पद 8अर्थ
    श्री गौर के इन वचनों को सुनकर राधामोहन इस गीत में उन्हें फिर से कहते हैं।
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श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 4भजन
    ऐछन हेर-इते कान्दे नर-नरी
    ए राधामोहन मरु य-इ बलिहारि
  • पद 4अर्थ
    यह देखकर सब लोग रो पड़ते हैं। यह राधामोहन दास अपना सब कुछ श्री गौर को समर्पित करता है।
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श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 3भजन
    खोल करताल कीर्तन रसाल
    घन घन हरि-बोल
    जय जय ध्वनि सुरमण-मणि
    गगने उठय रोल
  • पद 3अर्थ
    खोल और करताल बजते हैं। कीर्तन मधुर है। ऊँचे स्वर में "हरिबोल!" की ध्वनि गूँजती है। "जय! जय!" की ध्वनियाँ, जो समस्त सुखों के रत्नों के समान हैं, आकाश को भर देती हैं।
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श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 5भजन
    जय गौर बलि दु-इ बाहु तुलि
    करे रोल यात्रि-गण
    दुंहार प्रभाबे करि अनुभब
    यदुर बिस्मित मन
  • पद 5अर्थ
    रथयात्रा के भक्तजन दोनों बाहें उठाकर पुकारते हैं, "जय गौर!" श्री जगन्नाथ और श्री गौर दोनों की दिव्य शक्ति को अपनी आँखों से देखकर यह यदु दास आश्चर्य से चकित हो जाता है।
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श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 2भजन
    जय जय नित्यानन्द राम
    कनक-चम्पक पाति अङ्गुले चान्देर पान्ति
    रूपे जितल कोटि काम
  • पद 2अर्थ
    जय जय भगवान नित्यानन्द-राम की! उनका वर्ण अनेक सुवर्ण चंपा के फूलों को भी लजा देता है। उनके हाथों-पैरों के नाखून अनेक चंद्रमाओं को भी लजा देते हैं। उनका सुंदर रूप करोड़ों कामदेवों को भी लजा देता है।
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श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 4भजन
    ब्रह्मा आदि देब-गण करे पुष्प बरिषण
    जय जय ध्वनि अनिबार
    गन्धर्ब किन्नर यत बाय बड्य शत शत
    गाय गुण सुखेर पथार
  • पद 4अर्थ
    ब्रह्मा और देवगण पुष्पों की वर्षा करते हैं। वे निरंतर जय जय की ध्वनि करते हैं। सैकड़ों-सैकड़ों गंधर्व और किन्नर वाद्य बजाते हैं और भगवान नित्यानंद के गुणों के आनंद-सागर की स्तुति में गीत गाते हैं।