वसतु मनो मम मदन गोपाले
मेरा मन मदन-गोपाल में निवास करे, जो सदा-नूतन प्रेम-लीलाओं की चरम सीमा हैं, जो राधा के साथ प्रेम-क्रीड़ा के रस का अन्तिम सीमा तक आस्वादन करते हैं।
उनकी घुँघराली अलकें मत्त मयूर के पंख से मुकुटित हैं। उनकी बाँसुरी की ध्वनि सदा नई-नई युवतियों के झुंड की लज्जा को दूर भगा देती है, जो दौड़ी चली आती हैं।
वे यमुना के उज्ज्वल, बालू भरे तट पर एक शोभायमान कल्पवृक्ष के नीचे खड़े हैं, उनकी कमर पर सुशोभित कोमल पीत वस्त्र छोटी घंटियों की झंकार से और भी मनोहर हो उठा है।
वे किशोर, जिनकी बाँसुरी मनोहर है और जिनके अधर उससे भी मधुर हैं, मेघ की शोभा को भी चुरा लेते हैं। वे श्री वृषभानु-नन्दिनी के चन्द्रमा-से मनोहर मुख का सदा पान करने वाले चकोर हैं।
गुंजा की माला, मकर के आकार के मणि-जड़ित कुण्डल, कंगन और नूपुरों से सुशोभित, उनकी कोमल, मधुर मुस्कान और मनमोहक चितवन रसिक स्त्रियों के हृदय में गहरी लालसा जगा देती है।
वन-पुष्पों की माला उनके गले में झूल रही है, जिस पर मतवाले भ्रमर गुंजार कर रहे हैं। उनकी चौड़ी, सुन्दर भुजाएँ, सुगन्धित उबटन से मली हुई, आनन्द के रोमांच से भरी हुई हैं।
एक चमकीला रत्न-जड़ित तिलक उनकी चंचल अलकों से और उभर आता है, उनकी नासिका स्वर्ण और मोती से सुसज्जित है। उनका कमल-मुख शरद ऋतु के करोड़ों चन्द्रमाओं की अमृत-किरणें बरसाती हुई कान्ति के समान खिल उठता है।
उनकी ग्रीवा, कटि और चरण मोहक वक्रता में मुड़े हुए हैं, उनका रूप सदा नवीन और सुकुमार है, वे वृन्दावन के नित्य नए कुंजों और कुटीरों में प्रेम-क्रीड़ा के रंगमंच में सदा स्थिर हैं।
उनके कान्तिमान अंग सुगन्धित केसर और चन्दन के लेप से भली-भाँति अभिषिक्त हैं। उनका स्वरूप परम आनन्दमय रस का साक्षात् मूर्त रूप है, जिसमें प्रेम-लालसा की उठती हुई लहरें प्रवाहित होती रहती हैं।
उनके चरण-नखों की चन्द्रमा-सी चमक करोड़ों कामदेवों के समवेत तेज को भी लज्जित कर देती है। वे व्रज के युवराज हैं, अद्भुत और लीलामय क्रीड़ाओं में निपुण।
रसिक सरस्वती द्वारा वर्णित यह माधव के अमृतमय रूप-रस का सार है। हे बुद्धिमानो, अपने हृदय को भली-भाँति इसी में रमाओ। तुम व्यर्थ ही असार वस्तुओं में क्यों भटकते हो?
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- प्रबोधानन्द सरस्वती
- पद
- 11