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वसतु मनो मम मदन गोपले

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AI-निर्मित अनुवाद — समीक्षा लंबित

वसतु मनो मम मदन-गोपले नव-रति-केलि-विलस-परवधि-रध-सुरत-रसले
अर्थ

मेरा मन मदन-गोपाल में निवास करे, जो सदा-नूतन प्रेम-लीलाओं की चरम सीमा हैं, जो राधा के साथ प्रेम-क्रीड़ा के रस का अन्तिम सीमा तक आस्वादन करते हैं।

मद-सिखि-पिन्छ-मुकुत-परिलन्छित-कुन्चित-कच-निकुरम्बे मुखरित-वेनु-हत-त्रप-धवित-नव-नव-युवति-कदम्बे
अर्थ

उनकी घुँघराली अलकें मत्त मयूर के पंख से मुकुटित हैं। उनकी बाँसुरी की ध्वनि सदा नई-नई युवतियों के झुंड की लज्जा को दूर भगा देती है, जो दौड़ी चली आती हैं।

कलित-कलिन्द-सुत-पुलिन-उज्ज्वल-कल्प-महिरुह-मुले किङ्किनि-कलरव-रन्जित-कति-तत-कोमल-पित-दुकुले
अर्थ

वे यमुना के उज्ज्वल, बालू भरे तट पर एक शोभायमान कल्पवृक्ष के नीचे खड़े हैं, उनकी कमर पर सुशोभित कोमल पीत वस्त्र छोटी घंटियों की झंकार से और भी मनोहर हो उठा है।

मुरलि-मनोहर-मधुरतर-अधर-घन-रुचि-चौर-किसोरे स्रि-व्र्सभनु-कुमरि-मोहन-रुचि-मुख-चन्द्र-चकोरे
अर्थ

वह युवक, जिनकी बाँसुरी मनोहर है और जिनके अधर उससे भी मधुर हैं, देखने वालों की सुध-बुध हर लेता है। वे तो उस चकोर पक्षी के समान हैं, जो सदा श्री वृषभानु-नन्दिनी के चन्द्रमा-समान मनोहर मुख का पान करते रहते हैं।

गुन्ज-हर-मकर-मनि-कुन्दल-कङ्कन-नुपुर-सोभे म्र्दु-मधुर-स्मित-चरु-विलोकन-रसिक-वधु-क्र्त-लोभे
अर्थ

गुंजा की माला, मकर के आकार के कुण्डल, कंगन और नूपुरों से सुशोभित, उनकी कोमल, मधुर मुस्कान और मनमोहक चितवन रसिक स्त्रियों के हृदय में गहरी लालसा जगा देती है।

मत्त-मधुव्रत-गुन्जित-रन्जित-गल-दोलित-वनमले गन्ध-उद्वर्त्तित-सुवलित-सुन्दर-पुलकित-बहु-विसले
अर्थ

वन-पुष्पों की माला उनके गले में झूल रही है, जिस पर मतवाले भ्रमर गुंजार कर रहे हैं। उनकी चौड़ी, सुन्दर भुजाएँ, सुगन्धित चन्दन से लेपित, आनन्द के रोमांच से भरी हुई हैं।

उज्ज्वल-रत्न-तिलक-ललितलक-स-कनक-मौक्तिक-नसे सरद-कोति-सुध-किरन-उज्ज्वल-स्रि-मुख-कमल-विकसे
अर्थ

एक चमकीला रत्न-जड़ित तिलक उनकी चंचल अलकों से और उभर आता है, उनकी नासिका स्वर्ण और मोती से सुसज्जित है। उनका कमल-मुख शरद ऋतु के करोड़ों चन्द्रमाओं की अमृत-किरणें बरसाती हुई कान्ति के समान खिल उठता है।

ग्रिव-कति-पद-भङ्गि-मनोहर-नव-सुकुमर-सरिरे व्र्न्दवन-नव-कुन्ज-ग्र्ह-अन्तर-रति-रन-रङ्ग-सुधिरे
अर्थ

उनकी ग्रीवा, कटि और चरण मोहक वक्रता में मुड़े हुए हैं, उनका रूप सदा नवीन और सुकुमार है, वे वृन्दावन के नित्य नए कुंजों और कुटीरों में प्रेम-क्रीड़ा के रंगमंच में सदा स्थिर हैं।

परिमल-सर-स-केसर-चन्दन-चर्च्चिततर-लसद्-अङ्गे परमनन्द-रसैक-घनक्र्ति-प्रवहद्-अनङ्ग-तरङ्गे
अर्थ

उनके कान्तिमान अंग सुगन्धित केसर और चन्दन के लेप से भली-भाँति अभिषिक्त हैं। उनका स्वरूप परम आनन्दमय रस का साक्षात् मूर्त रूप है, जिसमें प्रेम-लालसा की उठती हुई लहरें प्रवाहित होती रहती हैं।

पद-नख-चन्द्र-मनि-छ्हवि-लज्जित-मनसिज-कोति-समजे अद्भुत-केलि-विलस-विसरद-व्रजपुर-नवयुव-रजे
अर्थ

उनके चरण-नखों की चन्द्रमा-सी चमक करोड़ों कामदेवों के समवेत तेज को भी लज्जित कर देती है। वे व्रज के युवराज हैं, अद्भुत और लीलामय क्रीड़ाओं में निपुण।

रसिक-सरस्वति-वर्नित-मधव-रुप-सुध-रस-सरे रमयत सधु बुध निज-ह्र्दयं भ्रमथ मुध किम् असरे
अर्थ

रसिक भक्तों की वाणी द्वारा माधव के अमृतमय सौन्दर्य के सार रूप में वर्णित, हे बुद्धिमानो, तुम्हारा हृदय सचमुच उन्हीं में आनन्दित हो। हे मूर्खो, तुम व्यर्थ वस्तुओं के पीछे क्यों भटकते हो?