यस्यह् कदपि वसन्चल
AI-निर्मित अनुवाद — समीक्षा लंबित
जिनके वस्त्र के आँचल के हिलने मात्र से उठी हुई धन्य, अति धन्य वायु से, बड़े-बड़े योगियों के लिए भी दुर्लभ गति रखनेवाले मधुसूदन भी स्वयं को कृतार्थ मानते हैं, उन वृषभानु-नंदिनी को, वे जिस दिशा में हों उसी दिशा को भी, प्रणाम है।
वृषभानु-नंदिनी की महिमा को प्रणाम, जिनके चरण-कमलों की परम अद्भुत वैभवशाली रज ब्रह्मा, शिव आदि को भी अत्यंत दुर्लभ है, और जिनकी करुणा से भीगी दृष्टि सभी अभीष्ट फलों का सार-रस बरसाती है।
ब्रह्मा, रुद्र, शुक, नारद, भीष्म आदि श्रेष्ठ महापुरुषों के लिए भी सहज ही न जाने जानेवाले उन पुरुषोत्तम कृष्ण को भी तुरंत वश में करनेवाली, अनंत शक्तिसंपन्न राधिका के चरणों की उस रज का मैं निरंतर स्मरण करता हूँ।
जिनके चरण-कमलों के मणि-सम नखों की चंद्रमा-सी आभा से गोपियों में कोई अनिर्वचनीय आलोक दिखाई पड़ा, प्रेम के परिपूर्ण सागर का सार-साक्षात रूप वह राधिका किसी दिन मुझ पर कृपा करें।
हे श्री राधिके, शुद्ध प्रेम के सागर के मकरंद-रस की धाराएँ निरंतर चारों ओर तुम्हारी शरण लेनेवालों की ओर बहती हैं। कब मैं तुम्हारे उन चरण-कमलों को अपने सिर पर धारण करूँगा, जो गोविंद के प्राणों का धन हैं?