Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

वसतु मनो मम मदन गोपाले

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AI-निर्मित अनुवाद — समीक्षा लंबित

वसतु मनो मम मदन-गोपाले नव-रति-केलि-विलास-परावधि-राधा-सुरत-रसाले
अर्थ

मेरा मन मदन-गोपाल में निवास करे, जो सदा-नूतन प्रेम-लीलाओं की चरम सीमा हैं, जो राधा के साथ प्रेम-क्रीड़ा के रस का अन्तिम सीमा तक आस्वादन करते हैं।

मद-शिखि-पिञ्छ-मुकुट-परिलाञ्छित-कुञ्चित-कच-निकुरम्बे मुखरित-वेणु-हत-त्रप-धावित-नव-नव-युवति-कदम्बे
अर्थ

उनकी घुँघराली अलकें मत्त मयूर के पंख से मुकुटित हैं। उनकी बाँसुरी की ध्वनि सदा नई-नई युवतियों के झुंड की लज्जा को दूर भगा देती है, जो दौड़ी चली आती हैं।

कलित-कलिन्द-सुता-पुलिन-उज्ज्वल-कल्प-महीरुह-मूले किङ्किणी-कलरव-रञ्जित-कटि-तट-कोमल-पीत-दुकूले
अर्थ

वे यमुना के उज्ज्वल, बालू भरे तट पर एक शोभायमान कल्पवृक्ष के नीचे खड़े हैं, उनकी कमर पर सुशोभित कोमल पीत वस्त्र छोटी घंटियों की झंकार से और भी मनोहर हो उठा है।

मुरली-मनोहर-मधुरतर-अधर-घन-रुचि-चौर-किशोरे श्री-वृषभानु-कुमारी-मोहन-रुचि-मुख-चन्द्र-चकोरे
अर्थ

वे किशोर, जिनकी बाँसुरी मनोहर है और जिनके अधर उससे भी मधुर हैं, मेघ की शोभा को भी चुरा लेते हैं। वे श्री वृषभानु-नन्दिनी के चन्द्रमा-से मनोहर मुख का सदा पान करने वाले चकोर हैं।

गुञ्जा-हार-मकर-मणि-कुण्डल-कङ्कण-नूपुर-शोभे मृदु-मधुर-स्मित-चारु-विलोकन-रसिक-वधू-कृत-लोभे
अर्थ

गुंजा की माला, मकर के आकार के कुण्डल, कंगन और नूपुरों से सुशोभित, उनकी कोमल, मधुर मुस्कान और मनमोहक चितवन रसिक स्त्रियों के हृदय में गहरी लालसा जगा देती है।

मत्त-मधुव्रत-गुञ्जित-रञ्जित-गल-दोलित-वनमाले गन्ध-उद्वर्त्तित-सुवलित-सुन्दर-पुलकित-बाहु-विशाले
अर्थ

वन-पुष्पों की माला उनके गले में झूल रही है, जिस पर मतवाले भ्रमर गुंजार कर रहे हैं। उनकी चौड़ी, सुन्दर भुजाएँ, सुगन्धित चन्दन से लेपित, आनन्द के रोमांच से भरी हुई हैं।

उज्ज्वल-रत्न-तिलक-ललितालक-स-कनक-मौक्तिक-नासे शारद-कोटि-सुधा-किरण-उज्ज्वल-श्री-मुख-कमल-विकासे
अर्थ

एक चमकीला रत्न-जड़ित तिलक उनकी चंचल अलकों से और उभर आता है, उनकी नासिका स्वर्ण और मोती से सुसज्जित है। उनका कमल-मुख शरद ऋतु के करोड़ों चन्द्रमाओं की अमृत-किरणें बरसाती हुई कान्ति के समान खिल उठता है।

ग्रीवा-कटि-पद-भङ्गि-मनोहर-नव-सुकुमार-शरीरे वृन्दावन-नव-कुञ्ज-गृह-अन्तर-रति-रण-रङ्ग-सुधीरे
अर्थ

उनकी ग्रीवा, कटि और चरण मोहक वक्रता में मुड़े हुए हैं, उनका रूप सदा नवीन और सुकुमार है, वे वृन्दावन के नित्य नए कुंजों और कुटीरों में प्रेम-क्रीड़ा के रंगमंच में सदा स्थिर हैं।

परिमल-सार-स-केसर-चन्दन-चर्च्चिततर-लसद्-अङ्गे परमानन्द-रसैक-घनाकृति-प्रवहद्-अनङ्ग-तरङ्गे
अर्थ

उनके कान्तिमान अंग सुगन्धित केसर और चन्दन के लेप से भली-भाँति अभिषिक्त हैं। उनका स्वरूप परम आनन्दमय रस का साक्षात् मूर्त रूप है, जिसमें प्रेम-लालसा की उठती हुई लहरें प्रवाहित होती रहती हैं।

पद-नख-चन्द्र-मणि-छवि-लज्जित-मनसिज-कोटि-समाजे अद्भुत-केलि-विलास-विशारद-व्रजपुर-नवयुव-राजे
अर्थ

उनके चरण-नखों की चन्द्रमा-सी चमक करोड़ों कामदेवों के समवेत तेज को भी लज्जित कर देती है। वे व्रज के युवराज हैं, अद्भुत और लीलामय क्रीड़ाओं में निपुण।

रसिक-सरस्वती-वर्णित-माधव-रूप-सुधा-रस-सारे रमयत साधु बुधा निज-हृदयं भ्रमथ मुधा किम् असारे
अर्थ

रसिक भक्तों की वाणी द्वारा माधव के अमृतमय सौन्दर्य के सार रूप में वर्णित, हे बुद्धिमानो, तुम्हारा हृदय सचमुच उन्हीं में आनन्दित हो। हे मूर्खो, तुम व्यर्थ वस्तुओं के पीछे क्यों भटकते हो?