Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

आजु कि आनन्द नदीया नगरे, जगा इ माधा इ दोहे देखिबारे

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आजु कि आनन्द नदीया-नगरे, जगा-इ माधा-इ दोहे देखिबारे धाय चारि-दिके कि नारी पुरुष, परस्पर कहे कत ना कथा केह कहे अति बिरलेते रैया, ऐ देख देख दुहुं पाने चा-इया सूरुजेर सम तेज एबे भेल, से पाप-शरीर गेल बा कोथा
अर्थ

नदिया नगर में आज कैसा आनंद छा गया है! चारों दिशाओं से स्त्री-पुरुष जगाई और माधाई को देखने दौड़ पड़ते हैं। वे आपस में क्या क्या नहीं कहते! कोई चुपके से कहता है, देखो! देखो! वे सूर्य के समान तेजोमय हो गए हैं! उनके अनेक पापों से बना शरीर कहां चला गया?

केह कहे अह मरि मरि मरि, भाबे गर गर बैसे बेरि बेरि कान्दि उठे छूटे आङ्खि बारि-धारा, निबारिते नारे ना धरे धृति केह कहे हेन देख निरुपम, पुलकित तनु काम्पे घन घन धूलय धूसर धरणीते पडि, गडि याय किछु नाहिक स्मृति
अर्थ

कोई और कहता है, हा! हा! हा! हा! वे प्रेमभाव से अभिभूत हो गए हैं! वे रोते हैं। उनकी आंखों से अश्रुओं की नदियां बह रही हैं। उन्हें स्वयं को रोकने की शक्ति नहीं रहती। कोई और कहता है, देखो! वे कांप रहे हैं। उनके रोम रोम पुलकित हो उठे हैं। वे भूमि पर गिरकर लोटने लगते हैं। उनके शरीर धूल से ढक गए हैं। अब वे मूर्च्छित हो गए हैं।

केह कहे कि बा गोरा मुख शशी, पाने चाहे जानि कत सुखे भासि हासि सुधा-पाने उनमत हैया, लोटा-इया पडे चरण-तले केह कहे देख निता-इ-चान्देरे, चाहि हिया माझे कत खेद करे दु-खानि चरण परशिया करे, करे अभिषेक आङ्खेर जले
अर्थ

कोई और कहता है, 'भगवान् गौर के चन्द्रमा जैसे मुख को देखते हुए वे कितने आनन्द में तैर रहे हैं! भगवान् गौर की मुसकान का अमृत उन्हें आनन्द से मतवाला कर देता है। धरती पर लोटते हुए वे भगवान् गौर के चरणों में गिर पड़ते हैं।' कोई और कहता है, 'देखो! भगवान् निताईचन्द्र को देखकर उन्हें कितनी व्यथा होती है! वे उनके चरण छूते हैं। वे अपने आँसुओं से उनके चरणों को नहला देते हैं।'

केह कहे देख अद्वैत तपसी, गदाधर श्रीबासादि पाशे बसि अतुल उलसे फुलि फुलि फिरे, ल-इया सबार चरण-धूलि केह केह दुहुं कातर-अन्तरे, एक भिते रहि दन्ते तृण धरे नरहरि पहुं परिकर सह कर कृपा कहे दु-बाहु तुलि
अर्थ

कोई और कहता है, 'आनन्द से खिलकर वे तपस्वी अद्वैत, गदाधर, श्रीवास और बहुत-से दूसरे भक्तों के पास जाते हैं। वे उन सबके चरणों की धूल लेते हैं।' कोई और कहता है, 'मन में पछतावा लिये, दाँतों में तिनका दबाकर और बाहें फैलाकर वे नरहरि के स्वामी के पार्षदों के पास जाते हैं और विनती करते हैं, "हम पर कृपा कीजिए।"'