ठाकुर वैष्णव पद
ठाकुर वैष्णव-पद अवनीर सु-सम्पद
भगवान के नाम, रूप, गुण और लीलाओं की स्तुति करते आनन्द भरे भजन।
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ठाकुर वैष्णव-पद अवनीर सु-सम्पद
(आमि) जमुना-पुलिने, कदम्ब-कानने,
जनम स-फल ता'र कृष्ण-दरशन जा'र
हरि हे
रमणी-शिरोमणि बृषभानु-नन्दिनी
ओहे हरि-नाम तब महिमा अपार
बिश्वे उदित नाम-तपन
श्री नन्द-नन्दनाष्टक
श्री हरि-नामाष्टक
हरि-नाम तुया अनेक स्वरूप
हरि हे
हरि हे
अपरूप रथ आगे
हरि हे
अशेष गुणेर निधि गौराङ्ग-सुन्दर
आजु कि आनन्द नदीया-नगरे, जगा-इ माधा-इ दोहे देखिबारे
आजु कि आनन्द सङ्कीर्तने
आजु गोरा नगर-कीर्तने
आजु बिरह-भाबे गौराङ्गसुन्दर
आपने नचिते यबे प्रभुर मन हैल
हरि हे
हरि हे
हरि हे
हरि हे
आरे आमार गौर-किशोर
आरे मोर गौर-किशोर
आरे मोर नाचत गौर-किशोर
हरि हे
कलि-युगे श्री कृष्ण चैतन्य अबतार
किबा खोल करताल बाजे
कृष्ण-बंशी-गीत शुनि' देखि' चित्र-पत-खनि
गम्भीरे भितरे गौर राय
गोरा नाचे प्रेम बिनोदिया
गोरा बड दयार ठाकुर
गोरा मोर दयार अबधि गुण-निधि
चेतन पा-इया गोरा-राय
चैतन्य निता-इ आरे दोन भा-इ नाचे रे
चोदिगे गोबिन्द-ध्वनि शुनि पहुं हासे
चौदिके गोबिन्द-ध्वनि शुनि पहुं हासे
चौदिके महान्त मेलि करये कीर्तन-केलि
हरि हे
जय जय गौर-हरि शचीर नन्दन
जय जय हरि-नाम चिद्-आनन्दामृत-धाम
जीबे कृपा कोरि' गोलोकेर होरि
ज्ञानी ज्ञान-जोगे कोरिया जतने
हरि हे
हरि हे
हरि हे