आजु कि आनन्द नदीया नगरे, जगा इ माधा इ दोहे देखिबारे
नदिया नगर में आज कैसा आनंद छा गया है! चारों दिशाओं से स्त्री-पुरुष जगाई और माधाई को देखने दौड़ पड़ते हैं। वे आपस में क्या क्या नहीं कहते! कोई चुपके से कहता है, देखो! देखो! वे सूर्य के समान तेजोमय हो गए हैं! उनके अनेक पापों से बना शरीर कहां चला गया?
कोई और कहता है, हा! हा! हा! हा! वे प्रेमभाव से अभिभूत हो गए हैं! वे रोते हैं। उनकी आंखों से अश्रुओं की नदियां बह रही हैं। उन्हें स्वयं को रोकने की शक्ति नहीं रहती। कोई और कहता है, देखो! वे कांप रहे हैं। उनके रोम रोम पुलकित हो उठे हैं। वे भूमि पर गिरकर लोटने लगते हैं। उनके शरीर धूल से ढक गए हैं। अब वे मूर्च्छित हो गए हैं।
कोई और कहता है, 'भगवान् गौर के चन्द्रमा जैसे मुख को देखते हुए वे कितने आनन्द में तैर रहे हैं! भगवान् गौर की मुसकान का अमृत उन्हें आनन्द से मतवाला कर देता है। धरती पर लोटते हुए वे भगवान् गौर के चरणों में गिर पड़ते हैं।' कोई और कहता है, 'देखो! भगवान् निताईचन्द्र को देखकर उन्हें कितनी व्यथा होती है! वे उनके चरण छूते हैं। वे अपने आँसुओं से उनके चरणों को नहला देते हैं।'
कोई और कहता है, 'आनन्द से खिलकर वे तपस्वी अद्वैत, गदाधर, श्रीवास और बहुत-से दूसरे भक्तों के पास जाते हैं। वे उन सबके चरणों की धूल लेते हैं।' कोई और कहता है, 'मन में पछतावा लिये, दाँतों में तिनका दबाकर और बाहें फैलाकर वे नरहरि के स्वामी के पार्षदों के पास जाते हैं और विनती करते हैं, "हम पर कृपा कीजिए।"'