आमार जीवन
मेरा जीवन सदा पाप में लिप्त रहता है, पुण्य का तो कोई अंश भी नहीं है। मैं सदा दूसरे जीवों को चिन्ता और कष्ट देता रहा हूँ।
अपने ही सुख के लिये मैं किसी भी पाप-कर्म से पीछे नहीं हटता। मुझमें दया नहीं है, मैं केवल अपने स्वार्थ में लगा रहता हूँ। दूसरों के दुःख में मुझे सुख मिलता है, मैं सदा झूठ बोलता हूँ, और किसी को कष्ट में देखकर मन में आनन्द होता है।
मेरे हृदय में अनन्त कामनाएँ भरी हैं, मैं सदा क्रोधी और कपटी हूँ। इन्द्रिय-सुख के विषयों में मोहित होकर मैं उन्माद की स्थिति में रहता हूँ। द्वेष और मिथ्या-अभिमान ही मेरे आभूषण हैं।
निद्रा और आलस्य ने मुझे जीत लिया है, मैं सत्कर्म से सदा दूर भागता हूँ, परन्तु दुष्कर्म करने में मुझे बड़ा उत्साह रहता है। अपनी प्रतिष्ठा के लिये मैं सदा छल-कपट करता हूँ, लोभ ने मुझे जीत लिया है, और मैं सदा कामी हूँ।
मैं ऐसा पतित हूँ कि साधु-सन्तों की संगति भी मुझे नहीं मिली, और मैं सदा अपराधी बना रहा। मेरे जीवन में शुभ कर्म का कोई अंश नहीं है, और मेरा मन सदा किसी न किसी उपद्रव की ओर खिंचा रहता है। इसीलिये जीवन के इस अन्तिम पड़ाव में इन्हीं दुःखों से मैं जर्जर हो चुका हूँ।
अब बुढ़ापे में, और कोई उपाय न रहने से, मैं विवश होकर दीन और निरुपाय बन गया हूँ। इस प्रकार भक्तिविनोद अपने जीवन का यह दुःखमय निवेदन भगवान् के श्रीचरणों में प्रस्तुत करते हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- वैष्णव आचार्यों के भजन
- पद
- 6
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ऑडियो के लिए आभार: इस्कॉन डिज़ायर ट्री, इस्कॉन भक्त। सभी भक्त गायकों की जय।