आपने नचिते यबे प्रभुर मन हैल
श्री गौर के मन में नाचने की इच्छा जागती है। उनके चारों ओर भक्त इकट्ठे हो जाते हैं।
गरजते हुए श्री गौर बेरोक-टोक नाचते हैं। गोल-गोल घूमकर नाचते हुए वे घूमती हुई जलती मशाल जैसे लगते हैं।
जब भी श्री गौर के नृत्य करते चरण भूमि को स्पर्श करते हैं, पृथ्वी तथा सब सागर और पर्वत काँप उठते हैं।
श्री गौर स्तब्ध हो जाते हैं। उनके शरीर के रोम खड़े हो जाते हैं। वे रोते हैं। उन्हें पसीना आता है। उनका रंग पीला पड़ जाता है। वे दिव्य भाव के सभी लक्षण प्रकट करते हैं। वे बारी-बारी से गर्वित, आनन्दित और विनम्र हो जाते हैं।
श्री गौर के दिव्य नृत्य को देखकर श्री जगन्नाथ मुसकराते हैं। अब यदुनाथ दास आनन्द के सागर में तैरता है।