आरे आमार गौर किशोर
आह! मेरे गौर-किशोर को दिन-रात का ज्ञान नहीं रहता। बिना किसी कारण वे हँस उठते हैं। मेरे प्रभु का हृदय अभिभूत है।
एक क्षण वे ऊँचे स्वर में पुकार उठते हैं, 'मेरे प्रभु कहाँ हैं? मेरे प्राणनाथ कहाँ हैं?' एक क्षण ठण्ड से उनका शरीर काँपने लगता है। क्षण-क्षण में वे उछल पड़ते हैं। वे कहाँ चले गए?
एक क्षण वे दोनों बाहें उठाकर नाचते और गाते हैं। फिर क्षण-क्षण में विलाप करते हैं। एक अन्य क्षण वे आँखें मूँदकर "मेरे प्रभु!" पुकारते हुए रोते हैं। फिर क्षण-क्षण में वे व्यथा से भर जाते हैं।
नरहरि दास कहते हैं, मेरे प्रभु गौर-हरि ने वही प्रेम अनुभव किया जो राधा अनुभव करती हैं। हृदय में यह प्रेम धारण करके उन्होंने कलियुग का उद्धार किया। फिर भी मुझ नरहरि का उद्धार क्यों नहीं हुआ? मुझे क्यों वंचित रखा गया?