आसलो कथा बोल्ते कि
सच्चाई की बड़ी-बड़ी बातें करते हो तुम! तुम पुराने फटे कम्बल में लिपटे और लंगोटी बांधे हुए किसी त्यागी साधु जैसे दिखते हो, परन्तु यह सब वास्तव में केवल पाखंड है।
अपनी धर्म-पत्नी को घर में छोड़कर तुम दूसरों की पत्नियों का संग करते हो। धन के लोभ में द्वार-द्वार भटकते हो, और चुपके से इतना धन जोड़कर छिपा रखते हो।
तुम बड़े विश्वास से स्वयं को साधु गुरु के रूप में प्रस्तुत करते हो, और भोले-भाले लोगों के कान में कृष्ण-नाम कहकर उन्हें दीक्षा देने में लगे रहते हो, क्या यह व्यवहार एक बड़ा नाटक नहीं है?
क्या कोई केवल दूसरों को सलाह देने से 'गुरु' कहलाया जा सकता है? दूध का काम छाछ से कभी नहीं चलता। अब इस पर विचार करो और स्वयं देखो जो मैं देख रहा हूँ।
शांति, इन्द्रिय-संयम और सहनशीलता के बल पर जब सच्ची श्रद्धा उदय होती है, तब सांसारिक इच्छाएँ स्वयं त्याग दी जाती हैं। ऐसे में त्यागी चाँद बाउल कहते हैं, तुम्हारी इस अपरिपक्व नकल का अंत क्या होगा?