आमि तोमार् दुःखेर् दुःखी सुखेर् सुखी
आमि तोमार् दुःखेर् दुःखी सुखेर् सुखी,
बाउल संगीत में 12 भजन हैं, जिनके रचयिता भक्तिविनोद ठाकुर हैं।
बाउल संगीत की रचना भक्तिविनोद ठाकुर ने 1893 में की, उसी वर्ष जब शरणागति और गीतमाला भी लिखी गईं। इसका शीर्षक जो संकेत देता है, यह ग्रन्थ वैसा नहीं है। बाउल ग्रामीण बंगाल के घुमन्तू लोक-गायक थे, और आज भी हैं। वे एकतारा बजाते हैं और ऐसे गीत गाते हैं जिनमें वैष्णव धर्म, सूफ़ी मत और तन्त्र के तत्त्व मिलकर उनकी अपनी एक अलग रहस्यवादी परम्परा बनाते हैं। आगे चलकर रवीन्द्रनाथ ठाकुर भी इस परम्परा के प्रशंसक बने, और उन्होंने बाउल संगीत को बंगाल के गाँवों से बहुत दूर तक लोकप्रिय बनाने में मदद की। भक्तिविनोद के ये बारह गीत जान-बूझकर उसी लोक-शैली को अपनाते हैं, पर उसे स्वयं बाउलों के ही विरुद्ध मोड़ देते हैं। उन्होंने चाँद बाउल उपनाम से लिखा, ताकि इस गायन-शैली को चाहने वाले साधारण ग्रामवासी इन गीतों को सचमुच सुनें। इसी शैली के सहारे वे बाउलों और उनसे जुड़े कर्ताभजा सम्प्रदाय की उन प्रथाओं को उजागर करते हैं जिन्हें वे भ्रान्त और देह-केन्द्रित मानते थे। वे उनके दावों को एक-एक करके सुधारते हैं, और फिर हर गीत को सीधे, निष्ठापूर्ण हरिनाम-जप की ओर मोड़ देते हैं, जिसे वे उनके स्थान पर सच्चा मार्ग बता रहे थे। इसी कारण बाउल संगीत भक्तिविनोद की अधिक खण्डनात्मक रचनाओं में से एक है। कहीं-कहीं यह सचमुच जुझारू है। इसका उद्देश्य वैष्णव साधना में एक और चीज़ जोड़ना नहीं, बल्कि लोगों को उस चीज़ से दूर ले जाना है जिसे वे वैष्णव साधना का विकृत रूप मानते थे।
12 भजन
आमि तोमार् दुःखेर् दुःखी सुखेर् सुखी,
धर्म-पथे थाकि' कोरो जीवन जापन, भाइ
आसलो कथा बोल्ते कि
'बाउल् बाउल्' बोल्छे सबे, होच्छे बाउल् कोन् जना
मानुष-भजन् कोर्छो, ओ भाइ, भावेर् गान् धोरे'
एओ तो' एक कलिर् चेला
(मन आमार्) हुँसा'र् थेको, भूलो' नाको,
मनेर् माला जप्बि जखन्, मन,
घरे बोसे' बाउल् हओ रे मन,
बलवान् वैरागी ठाकुर्, किन्तु गृहीर् मध्ये बाहादुर्
केनो भेकेर् प्रयास्?
हो'ये विषये आवेश, पे'ले, मन, जातना अशेष