बलि कलि मत्त मतङ्गज मरदन, गौर सिंह नाचत नदीयाय
कलियुग के बलवान उन्मत्त गजराज को कुचलते हुए नदिया के सिंह भगवान गौर नृत्य करते हैं। जय! जय! की ध्वनि से सब लोक भर जाते हैं। चारों दिशाओं से सभी उनकी ओर दौड़ते हैं।
भगवान् गौर अपने प्रिय सहचरों के साथ गाते हैं। ऐसी तालों की तरंगें बहती हैं, जिन्हें किन्नर भी नहीं बजा सकते। मुरज और मृदंग बोल उठते हैं, 'दृमिकि दृमि दांदा द्रिमिकट धिकट धिलंग!'
भगवान् गौर के चरण-कमलों के स्पर्श से धरती काँप उठती है। भगवान् गौर का शरीर अनुपम ढंग से झूमता है। वे प्रेम में विभोर हैं। उनके शोभामय लाल नेत्रों को देखकर कितने कामदेव चकित रह जाते हैं!
उनका मनमोहक मुख अनेक चन्द्रमाओं को भी लजा देता है। उनकी कोमल-कोमल मुसकान अमृत की बहती धाराएँ हैं। नरहरि के स्वामी पतित पापियों को प्रेम का उपहार देते हैं। वे उन्हें अपनी बाहों में भर लेते हैं।