भाबाबेशे गोराचान्द बिभोर ह इया
गौरचन्द्र प्रेमभाव से अभिभूत हो जाते हैं। एक क्षण वे पुकार उठते हैं, "श्रीदामा! मेरे भाई!"
फिर वे पुकार उठते हैं, "सुबल!" फिर वे पुकार उठते हैं, "वसुदामा!" फिर वे पुकार उठते हैं, "बड़े भाई बलराम!"
वे पुकार उठते हैं, 'सफेद और काली सुरभि गायो!' उनके शरीर के रोम खड़े हो जाते हैं। प्रेम के आँसुओं की उमड़ती धाराएँ उनके शरीर पर बहती हैं।
वे पुकार उठते हैं, "कालिन्दी! यमुना!!" वे प्रेमानन्द की बाढ़ में तैरने लगते हैं। उनका हृदय कृष्ण-रूप में की गई अपनी पूर्व लीलाओं के स्मरण में तल्लीन हो जाता है। यह वंशीदास कहते हैं।