भुबन मोहन गोराचान्द
भगवान गौरचन्द्र समस्त लोकों को मोहित करते हैं। वे हर हृदय को पकड़ने के लिए बिछाया गया जाल हैं।
प्रेमभाव से अभिभूत होकर भगवान गौर नृत्य करते हैं। वे अपने रक्तवर्ण नेत्रों से बहते अश्रुओं में स्वयं तैरते रहते हैं।
अपनी बाहें उठाकर वे पुकारते हैं, 'हरि! हरि!' वे पतित जीवों को गले लगा लेते हैं।
वे प्रेम के अमृत में तैरते रहते हैं। उनके चारों ओर उनके सहचर गाते हैं।
उनका पग डगमगा जाता है। उनका कोमल शरीर धूल में गिर जाता है।
यह देखकर हर जीव रोने लगता है। नरहरि का हृदय अपनी वेदना को समेट नहीं पाता।