चैतन्य निता इ आरे दोन भा इ नाचे रे
आहा! दोनों भाई, गौर और निताई, नाचते हैं! पंचम स्वर में मधुर बजते हुए खोल और करताल बोल उठते हैं, 'ता थैया! ता थैया!'
गौर और निताई दिव्य प्रेम के अमृत-सागर में इधर-उधर हिलते हुए दो स्वर्ण कमलों के समान हैं। उस सागर की तरंगें अब हर व्यक्ति पर छलक रही हैं, ऊँच पर, नीच पर, दीन पर और पापी पर।
भक्त बड़े कोलाहल के साथ श्री जगन्नाथ की महिमा के गीत गाते हैं। भक्तों को देखकर श्री गौर राय नाचते हैं।
श्री गौर की लीलाएँ अद्भुत ऐश्वर्य और अद्भुत माधुर्य प्रकट करती हैं। यदुनाथ दास अब दिव्य आनन्द और प्रेम के सागर में तैरता है। यदुनाथ प्रभु की कृपा का एक कण पाने की आकांक्षा रखता है।