एओ तो' एक कलिर् चेला
यह भी तो कलियुग का एक और चेला है। वह सिर मुँड़ाए, लंगोटी बाँधे, नाक पर तिलक और गले में माला धारण करता है।
देखने में वह वैष्णव जैसा लगता है, परन्तु वास्तव में उसका आचरण शाक्त का है, जो भौतिक शक्ति की उपासना उसके भोग के लिए करता है। वह सहज-भजन के नाम पर दूसरों के बच्चों का 'मामा' बनकर उन्हीं की बेटियों के साथ चोरी-छिपे संग करता है।
इन युवतियों को सखी मानकर वह स्वयं को नंद-लाल समझने लगता है। सभी को कृष्ण-दास बनने का उपदेश देने की आड़ में वह वास्तव में अपने को ही 'कृष्ण' बना बैठता है, और इस छलपूर्ण उपदेश से यह कलियुग का चेला भगवान के सच्चे भक्तों पर मानो तीखा भाला चला देता है।
नव-रसिक होने का बनावटी दावा करते हुए वह अपनी ही मन की उपज के केले खाकर मौज मनाता है। चाँद बाउल कहते हैं, हे मेरे प्रिय भाइयों! भगवान की लीलाओं की इस झूठी नकल से दूर रहो।