घरे बोसे' बाउल् हओ रे मन
हे मेरे मन! घर में रहते हुए ही सच्चा बाउल बन जा। दुष्ट कर्मों में क्यों लगा रहता है?
तू मन के भीतर बाउल का भाव रख सकता है, और अनुचित संग त्यागकर धर्म के अनुसार स्वाभाविक रूप से सुख प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार तू हर क्षण हरिनाम के आनंद का अनुभव करते हुए अपना जीवन बिताएगा।
जो हृदय शुद्ध हुए बिना घर त्याग देता है, वह मर्कट-वैरागी अर्थात् बंदर जैसा त्यागी कहलाता है। हृदय में अपराधों से भरा हुआ और शत्रुओं के वश में पड़ा हुआ मनुष्य पग-पग पर और नीचे गिरता जाता है।
त्याग में अपरिपक्व त्यागी वह है जो दूसरों की पत्नियों को छलता है और मोटे बंदर की तरह मादा बंदरों के झुंड पर स्वामित्व जताता है। इसके अलावा, ऐसा व्यक्ति धन के लोभ में द्वार-द्वार भटकता है। इस प्रकार वह पतित और गिरे हुए लोगों की भी झूठी पूजा करता रहता है।
घर में रहते हुए ही अपने मन को परिपक्व बना। और प्रतिदिन हरिनाम-संकीर्तन करता रह। तब चाँद बाउल के संग में तू संसार का पूर्ण रूप से त्याग कर सकेगा।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- बाउल संगीत
- पद
- 5